भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 643

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

देनेवाले श्रीकृष्ण ही हैं। सबके दर्पका नाश करके उन्होंने उन सबपर कृपा ही की। वे ही जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। वे स्रष्टाके भी स्रष्टा हैं। भगवान् शंकर अपने पाँच मुखोंद्वारा भी उनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं। चार मुखोंवाले जगत्-विधाता ब्रह्माजी भी उनका स्तवन नहीं कर सकते। शेषनाग सहस्र मुखोंसे भी उनकी स्तुति करनेकी शक्ति नहीं रखते। साक्षात् विश्वव्यापी जनार्दन विष्णु भी उनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं। महाविराट् नारायण भी उन परमेश्वरकी स्तुति नहीं कर सके। प्रकृति उन परमात्माके सामने काँप उठती है। सरस्वती उन परमेश्वरका स्तवन करनेमें जडवत् हो जाती है। नारद! सम्पूर्ण वेद भी उनकी महिमाको नहीं जानते। ब्रह्मन्! इस प्रकार निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णके प्रभावका वर्णन किया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ५५)


इन्द्रके दर्प-भङ्गकी कथा, नहुषकी शचीपर कुदृष्टि, शचीका धर्मकी बातें बताकर नहुषको समझाना और उसके न माननेपर बृहस्पतिजीकी शरणमें जाकर उनका स्तवन करना

**सूतजी कहते हैं—**तदनन्तर नारदजीके पूछनेपर श्रीनारायणने संक्षेपसे कुछ लोगोंके दर्प-भङ्गकी घटनाएँ सुनायीं। फिर इन्द्रके दर्प-भङ्गका वृत्तान्त बताते हुए बोले।

**श्रीनारायणने कहा—**नारद! इस प्रकार सबके दर्प-भङ्गका प्रसङ्ग कहा गया। अब इन्द्रके दर्प-भञ्जनकी घटना विस्तारपूर्वक सुनो। एक समय इन्द्र अपने ब्रह्मनिष्ठ गुरु बृहस्पतिको आते देखकर भी सभामें दर्पवश अपने श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनसे नहीं उठे। इसे गुरुने अपना अपमान समझा और वे अत्यन्त रुष्ट हो वहाँसे लौट गये। यद्यपि उनके मनमें इन्द्रके प्रति द्वेषभावका उदय हुआ था, तथापि धर्मात्मा गुरुने स्नेहवश कृपा करके उन्हें शाप नहीं दिया; परंतु शाप न मिलनेपर भी इन्द्रका घमंड चूर हो गया। यदि दूसरा कोई धर्म अथवा प्रेमका विचार करके किसीके भारी अपराध करनेपर भी शाप न दे तो भी उसका वह अपराध अवश्य फल देता है। नारद! धर्मदेव ही उस पापीका नाश कर देते हैं। जो धर्मात्मा पुरुष जिस हिंसक या अपराधीको क्रोधपूर्वक शाप दे देता है, उसके उस शापसे अपराधीका अवश्य विनाश होता है; परंतु उस धर्मात्मा पुरुषका धर्म भी उसी मात्रामें क्षीण हो जाता है। इन्द्रने जो गुरुका अपमानरूप अधर्म किया था, उसके कारण वे ब्रह्महत्याके भागी हुए। ब्रह्महत्यासे डरे हुए इन्द्र अपना राज्य छोड़कर एक पवित्र सरोवरको चले गये और उस सरोवरके कमल-नालमें निवास करने लगे। भारतवर्षमें भगवान् विष्णुका वह सरोवर पुण्यमय तीर्थ और तपस्वीजनोंके तपका श्रेष्ठ स्थान है। वहाँ ब्रह्महत्या नहीं जा सकती। उसीको पुराणवेत्ता पुरुष 'पुष्कर'* तीर्थ कहते हैं। इन्द्रको राज्यभ्रष्ट हुआ देख धर्मात्मा हरिभक्त नरेश नहुषने उनके राज्यपर बलपूर्वक अधिकार कर लिया। एक दिन मनोहर अङ्गवाली सुन्दरी शची, जिनके कोई संतान नहीं थी, पतिवियोगके कारण व्यथित-हृदयसे आकाशगङ्गाके तटपर जा रही थीं। उस समय नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय अलंकारोंसे


* ४७वें अध्यायमें भी यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ ५६वें श्लोकमें कहा गया है कि इन्द्रने मानसरोवरमें प्रवेश किया था—'विवेश मानससरः।' यहाँ पुष्करतीर्थमें इन्द्रका प्रवेश कहा गया है। यदि वहाँके 'मानस-सरः' का अर्थ केवल सरोवरमात्र हो तो दोनों स्थानोंके वर्णनमें एकता आ सकती है।