ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६३६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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वह उस दिन भी शुद्ध नहीं मानी जाती। दूसरेके लिये वह उस दिन असत् शूद्राके समान होती है। जो पहले दिन अपनी रजस्वला पत्नीके साथ समागम करता है, वह ब्रह्महत्याके चौथे अंशका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। वह पुरुष देवकर्म तथा पितृकर्ममें सम्मिलित होने योग्य नहीं रह जाता। वह लोगोंमें अधम, निन्दित और अपयशका भागी समझा जाता है। जो दूसरे दिन रजस्वला स्त्रीके साथ कामभावसे समागम करता है, उसे अवश्य ही गो-हत्याका पाप लगता है। वह आजीवन देवता, पितर और ब्राह्मणकी पूजाके लिये अपना अधिकार खो बैठता है, मनुष्यतासे गिर जाता है तथा कलङ्कित हो जाता है। जो तीसरे दिन रजस्वला पत्नीके साथ समागम करता है, वह मूढ़ भ्रूण-हत्याका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है। पहले बताये हुए लोगोंकी भाँति वह भी पतित होकर सम्पूर्ण कर्मोंका अनधिकारी हो जाता है। चौथे दिन रजस्वला असत् शूद्रा कही जाती है; अतः विद्वान् पुरुष उस दिन भी उसके पास न जाय। मूढ़! मैं तेरी माता हूँ। यदि तू माताको भी बलपूर्वक ग्रहण करना चाहता है तो आज छोड़ दे। ऋतुकाल बीत जानेपर जैसी तेरी मर्जी हो, करना।
इतनेपर भी नहुष नहीं माना और बोला—'देवरमणी सदा ही शुद्ध होती है। तुम अपने घर चलो। मैं अभी आता हूँ'—यों कहकर राजा नहुष प्रसन्नतापूर्वक रत्नमय रथपर आरूढ़ हो नन्दनवनमें शचीके भवनकी ओर गया; परंतु शची अपने घरमें नहीं लौटी। वह सीधे गुरु बृहस्पतिके घर चली गयी। वहाँ जाकर उसने देखा गुरुदेव कुशासनपर विराजमान हैं। तारादेवी उनके चरणारविन्दोंकी सेवा कर रही हैं। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान हैं और हाथमें जपमाला लिये अपने अभीष्ट देव श्रीकृष्णके नामका निरन्तर जप कर रहे हैं। वे श्रीकृष्ण सबसे उत्कृष्ट, परमानन्दमय, परमात्मा एवं ईश्वर हैं। निर्गुण, निरीह, स्वतन्त्र, प्रकृतिसे परे, स्वेच्छामय परब्रह्म हैं तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही शरीर धारण करते हैं। उनके चिन्तनमें लगे और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाते हुए गुरुदेवको शचीने धरतीपर माथा टेककर प्रणाम किया। उस समय भक्तिके समुद्रमें मग्न हुई शची रोती और आँखोंसे आँसू बहाती थी। साथ ही वह शोक-सागरमें भी डूब रही थी। भयभीत शची व्यथित-हृदयसे अपने ब्रह्मनिष्ठ गुरु कृपानिधान बृहस्पतिकी स्तुति करने लगी।
**शची बोली—**महाभाग! मैं भयभीत हो आपकी शरणमें आयी हूँ। आप ईश्वर हैं और मैं शोकसागरमें डूबी हुई आपकी दासी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। गुरु असमर्थ हो या समर्थ, बलवान् हो या निर्बल, वह अपने शिष्यों, पत्नी तथा पुत्रोंपर सदा शासन करनेमें समर्थ है। प्रभो! आपने अपने शिष्यको उसके राज्यसे दूर कर दिया। बहुत दिन हुए, अब तो उसके दोषकी शान्ति हो गयी होगी। अतः कृपा कीजिये। कृपानिधे! मैं अनाथ हूँ। मेरे लिये सब दिशाएँ सूनी हो गयी हैं। अमरावतीपुरी भी सूनी है तथा मेरा निवासस्थान भी सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे शून्य है। मेरी इस अवस्थापर दृष्टिपात कीजिये और मुझे संकटसे बचाइये। मुझे एक डाकू अपना ग्रास बनाना चाहता है। आप मेरी रक्षा कीजिये। अपने किङ्कर देवराजको यहाँ ले आइये। चरणोंकी धूल देकर उन्हें शुभाशीर्वादसे अनुगृहीत कीजिये।
समस्त गुरुओंमें जन्मदाता पिता श्रेष्ठ गुरु माने गये हैं। पिताकी अपेक्षा माता सौगुनी अधिक पूजनीया, वन्दनीया तथा वरिष्ठ है; परंतु जो विद्यादाता, मन्त्रदाता, ज्ञानदाता और हरिभक्ति प्रदान करनेवाले गुरु हैं, वे मातासे भी सौगुने पूजनीय, वन्दनीय और सेव्य हैं। जिन्होंने