भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 648

६३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है, वही शिष्यका भी है। तर्पण, पिण्डदान, पालन और परितोषण—इन सभी कर्मोंके लिये पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं है। जैसे पुत्र पिताके मरनेपर उसके लिये अग्निदाता होता है, अवश्य उसी तरह शिष्य गुरुके लिये अग्निप्रदाता कहा गया है। यह बात कण्वशाखामें ब्रह्माजीने कही है। पिता, माता, गुरु, पत्नी, छोटा बालक, अनाथ एवं कुटुम्बीजन—ये पुरुषमात्रसे नित्य पोषण पानेके योग्य हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है*। जो इनका पोषण नहीं करता उसके शरीरके भस्म होनेतक उसे सूतक (अशौच)—का भागी होना पड़ता है। वह जीते-जी देवयज्ञ तथा पितृयज्ञमें कर्म करनेका अधिकारी नहीं रहता है—ऐसा महेश्वरका कथन है। जो माता, पिता और गुरुके प्रति मानव-बुद्धि रखता है, उसको सर्वत्र अयश प्राप्त होता है और उसे पग-पगपर विघ्नका ही सामना करना पड़ता है। जो सम्पत्तिसे मतवाला होकर अपने गुरुका अपमान करता है, उसका शीघ्र ही सर्वनाश हो जाता है; यह सुनिश्चित बात है। अपनी सभामें मुझे देखकर इन्द्र आसनसे नहीं उठे थे, उसीका फल इस समय भोग रहे हैं। गुरुके अपमानका शीघ्र ही जो कटु फल प्राप्त हुआ, उसे तुम अपनी आँखों देख लो। अब मैं इन्द्रको शापसे छुड़ाऊँगा और निश्चय ही तुम्हारी रक्षा करूँगा। जो शासन और संरक्षण दोनों ही कर सकता हो, वही गुरु कहलाता है। जो हृदयसे शुद्ध है अर्थात् जिसके हृदयमें कलुषित भाव नहीं पैदा हुआ है, उस नारीका सतीत्व नष्ट नहीं होता। परंतु जिसके मनमें विकल्प है, उसका धर्म नष्ट हो जाता है। पतिव्रते ! तुम्हारा दुर्गाजीके समान प्रभाव बढ़ेगा। तुम्हारी प्रतिष्ठा और यश लक्ष्मीजीके समान होंगे। सौभाग्य और पतिविषयक प्रेम श्रीराधिकाके समान होगा। स्वामीके प्रति गौरव, मान, प्रीति तथा प्रधानताका भाव भी तुममें श्रीराधाके ही सदृश होगा। रोहिणीके समान तुममें पतिकी अपेक्षा-बुद्धि होगी। तुम भारतीके समान पूजनीया तथा सावित्रीके तुल्य सदा शुद्धा एवं उपमारहित होओगी।

बृहस्पतिजी ऐसा कह ही रहे थे कि नहुषके दूतने वहाँ आकर शचीसे नन्दनवनमें चलनेके लिये कहा। यह सुनते ही बृहस्पतिजीका सारा शरीर क्रोधसे काँपने लगा और उनकी आँखें लाल हो गयीं। वे उस दूतसे बोले।

गुरुने कहा— दूत ! तू जाकर नहुषसे कह दे कि 'महाराज ! यदि तुम शचीका उपभोग करना चाहते हो तो एक ऐसी सवारीपर चढ़कर रातमें आना, जिसका आजसे पहले किसीने उपयोग न किया हो। सप्तर्षियोंके कंधोंपर अपनी सुन्दर शिविका (पालकी) रख उत्तम वेश-भूषासे सज-धजकर उसीपर आरूढ़ हो तुम्हें यहाँतक यात्रा करनी चाहिये।'

बृहस्पतिजीकी बात सुनकर दूतने नहुषके पास जा उनका संदेश कह सुनाया। सुनकर नहुष हँस पड़ा और अपने सेवकसे बोला— 'जाओ, जाओ, जल्दी जाओ और सप्तर्षियोंको यहाँ बुला लाओ। उन सबके साथ मिलकर कोई उपाय करूँगा। तुम अभी जाओ।'

राजाका आदेश पाकर दूत सप्तर्षियोंके समीप गया और नहुषने जो कुछ कहा था, वह सब उसने उन सबसे कह सुनाया। दूतकी बात सुनकर सप्तर्षि प्रसन्नतापूर्वक नहुषके पास गये। उन


* पिता माता गुरुर्भार्या शिशुश्चानाथबान्धवाः। एते पुंसां नित्यपोष्या इत्याह कमलोद्भवः॥
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