ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
फटकारने लगा। शिविकाके उस मार्गपर सबसे आगे चलते थे दुर्वासा। उन्हें राजाकी फटकारपर क्रोध आ गया और वे शाप देते हुए बोले—
'मूढ़चित्त महाराज! तुम महान् अजगर होकर नीचे गिर पड़ो। धर्मपुत्र युधिष्ठिरके दर्शन होनेसे तुम अजगरकी योनिसे छूट जाओगे। तत्पश्चात् रत्नमय विमानसे वैकुण्ठमें जाकर भगवान् विष्णुका सेवन करोगे। किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता। तुमने श्रीहरिकी आराधना की है; अतः शापसे छूटनेपर तुम्हें उसका फल अवश्य मिलेगा।'
महामुने! यों कहकर वे सब श्रेष्ठ मुनि हँसते हुए चले गये और राजा उनके शापसे सर्प होकर गिर पड़ा। वह समाचार सुनकर शची गुरुदेवको नमस्कार करके अमरावतीमें चली गयी और बृहस्पतिजी शीघ्र उस स्थानपर गये, जहाँ इन्द्र कमल-नालमें निवास करते थे। सरोवरके निकट जाकर कृपानिधान गुरुने अत्यन्त प्रसन्नवदन हो कृपापूर्वक देवराजको पुकारा।
बृहस्पति बोले— वत्स! आओ। मेरे रहते तुम्हें क्या भय हो सकता है? भय छोड़ो और यहाँ आओ। मैं तुम्हारा गुरु बृहस्पति हूँ।
अपने गुरुका स्वर सुनकर महेन्द्रका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सूक्ष्मरूपको छोड़कर अपने ही रूपसे उनके निकट आये। उन्होंने भक्तिभावसे गुरुके चरणोंमें दण्डकी भाँति पड़कर सिरसे उन्हें प्रणाम किया और रोने लगे। उस समय महाभयभीत एवं रोते हुए इन्द्रको गुरुने सानन्द हृदयसे लगा लिया। फिर उनसे प्रायश्चित्तके लिये सोमयाग करवाकर उन्हें रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया और पहलेसे चौगुना उत्तम ऐश्वर्य प्रदान किया। तदनन्तर सब देवता आकर उनकी सेवा करने लगे। शचीने पुनः अपने पति देवराज इन्द्रको प्राप्त कर लिया और निवासमन्दिरमें फूलोंकी सेजपर वह उनके साथ आनन्दपूर्वक सुखका अनुभव करने लगी। वत्स! इस प्रकार मैंने इन्द्रके दर्पके भञ्जन तथा शचीके सतीत्वकी रक्षाका प्रसङ्ग कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
तदनन्तर नारदके पूछनेपर श्रीनारायणने इन्द्रदर्प-भङ्गके ही प्रसङ्गमें गौतमके द्वारा इन्द्रको शाप प्राप्त होनेकी बात बतायी। साथ ही यह भी कहा कि अहल्या पतिके शापसे पाषाण-शिला हो गयी। गौतमने शाप देकर अहल्यासे कहा— 'जाओ, जाओ। तुम विशाल वनमें पाषाणरूपिणी हो जाओ। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी अंगुलिका स्पर्श पाकर तत्काल पवित्र हो जाओगी। उसी पुण्यसे फिर मुझे पाओगी और मेरे पास चली आओगी। प्रिये! इस समय तो विशाल वनमें ही जाओ।' ऐसा कहकर वे मुनि तपस्याके लिये चले गये।
(अध्याय ६०-६१)