भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 666

६५६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

**ब्रह्माजी बोले—**जगदीश्वर ! आपकी जय हो, जय हो। आपके चरणोंकी सभी वन्दना करते हैं। आप निर्गुण, निराकार और स्वेच्छामय हैं। सदा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं और वह श्रीविग्रह नित्य है। मायासे गोपवेष धारण करनेवाले मायापते ! आपकी वेश-भूषा तथा शील-स्वभाव सभी सुन्दर एवं मनोहर हैं। आप शान्त तथा सबके प्राणवल्लभ हैं। स्वभावतः इन्द्रिय-संयम और मनोनिग्रहसे सम्पन्न हैं। नितान्त ज्ञानानन्दस्वरूप, परात्परतर, प्रकृतिसे परे, सबके अन्तरात्मा, निर्लिप्त, साक्षिस्वरूप, व्यक्ताव्यक्तरूप, निरञ्जन, भूतलका भार उतारनेवाले, करुणासागर, शोक-संतापनाशन, जरा-मृत्यु और भय आदिको हर लेनेवाले, शरणागतरक्षक, भक्तोंपर दया करनेके लिये व्याकुल रहनेवाले, भक्तवत्सल, भक्तोंके संचित धन तथा सच्चिदानन्दस्वरूप हैं; आपको नमस्कार है। सबके अधिष्ठाता देवता तथा प्रीति प्रदान करनेवाले प्रभुको सादर नमस्कार है।

इस तरह बारंबार कहते हुए ब्रह्माजी प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गये। जो ब्रह्माजीद्वारा किये गये इस स्तोत्रको एकाग्रचित्त होकर सुनता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थोंकी सिद्धि होती है; इसमें संशय नहीं है।

इस प्रकार स्तुति और बारंबार प्रणाम करके जगद्विधाता ब्रह्माजी सचेत हो धीरे-धीरे उठे और पुनः भक्तिभावसे बोले।

**ब्रह्माजीने कहा—**देवदेवेश्वर ! उठिये। परमानन्दकारण ! सानन्द, नित्यानन्दमय नन्दनन्दन ! आपको नमस्कार है। नाथ ! नन्दभवनमें पधारिये और वृन्दावनको छोड़िये। सौ वर्षोंके लिये जो सुदामका शाप प्राप्त हुआ है, उसको स्मरण कीजिये। भक्तके शापको सफल बनानेके लिये प्रियाजीको उतने समयके लिये त्याग दीजिये। फिर इन्हें पाकर आप गोलोकमें पधारियेगा। देव ! आप पिताके घर जाकर वहाँ आये हुए अक्रूरजीसे मिलिये। वे आपके पितृव्य (चाचा), माननीय अतिथि तथा धन्यवादके योग्य सर्वसमर्थ वैष्णव हैं। भगवन् ! अब उनके साथ मधुपुरीकी यात्रा कीजिये। हरे ! वहाँ शिवके धनुषको तोड़िये और शत्रुगणोंको हतोत्साह कीजिये—मार भगाइये। दुरात्मा कंसका वध कीजिये और पिता-माताको सान्त्वना दीजिये। द्वारकापुरीका निर्माण कीजिये, भूतलका भार उतारिये, भगवान् शंकरकी वाराणसीपुरीको दग्ध कीजिये और इन्द्रके भवनपर भी धावा बोलिये। युद्धमें शिवजीको जृम्भास्त्रसे जृम्भित करके बाणासुरकी भुजाओंको काटिये। नाथ! इससे पहले आपको रुक्मिणीका हरण, नरकासुरका वध तथा सोलह हजार राजकुमारियोंका पाणिग्रहण करना है। व्रजेश्वर ! अब इन प्राणतुल्या प्रियतमाको छोड़िये और व्रजमें चलिये। उठिये, उठिये, आपका कल्याण हो। जबतक राधाकी नींद नहीं टूटती है; तभीतक चल दीजिये।

इतना कहकर ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओंके साथ ब्रह्मलोकको चले गये। साथ ही शेषनाग तथा शंकरजी भी अपने स्थानको पधारे। देवताओंने श्रीकृष्णके ऊपर प्रेम और भक्तिसे पुष्प और चन्दनकी वर्षा की। फिर आकाशवाणी हुई—‘प्रभो ! कंस वधके योग्य है; अतः उसका वध कीजिये; अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ाइये और पृथ्वीके भारका निवारण कीजिये।’ नारद ! इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर भूतभावन भगवान् श्रीकृष्ण भगवती राधाको छोड़कर धीरे-धीरे वहाँसे उठे। बारंबार पीछेकी ओर देखते हुए श्रीहरि कुछ दूरतक गये; फिर चन्दनवनमें वासस्थानके पास ही थोड़ी देरके लिये ठहर गये। उधर राधा निद्रा त्यागकर अपनी शय्यासे उठ बैठीं और शान्त, कान्त, प्राणवल्लभ श्रीहरिको वहाँ न देख विलाप करती हुई बोलीं—‘हा नाथ! हा रमणश्रेष्ठ ! हा प्राणेश्वर !