भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 672

६६२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वेदी कहे गये हैं; आपको नमस्कार है। वेदोंके अधिष्ठाता देवता और बीज भी आप ही हैं; आपको नमस्कार है। जिनके रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड नित्य निवास करते हैं, उन महाविष्णुके ईश्वर आप विश्वेश्वरको बारंबार नमस्कार है। आप स्वयं ही प्रकृतिरूप और प्राकृत पदार्थ हैं। प्रकृतिके ईश्वर तथा प्रधान पुरुष भी आप ही हैं। आपको बारंबार नमस्कार है*।

इस प्रकार स्तुति करके अक्रूरजी नन्दरायजीके सभाभवनमें मूर्च्छित हो गये और सहसा भूमिपर गिर पड़े। उसी अवस्थामें पुनः उन्होंने अपने हृदयमें और बाहर भी सब ओर उन श्यामसुन्दर सर्वेश्वर परमात्माको देखा। वे ही विश्वमें व्यास थे और वे ही विश्वरूपमें प्रकट हुए थे। नारद! अक्रूरजीको मूर्च्छित हुआ देख नन्दजीने आदरपूर्वक उठाया और रमणीय रत्नसिंहासनपर बिठा दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अक्रूरसे सारा वृत्तान्त पूछा और बारंबार कुशलप्रश्न करते हुए उन्हें मिष्टान्न भोजन कराया। अक्रूरने कंसका सारा वृत्तान्त कह सुनाया और यह भी कहा कि अपने माता-पिताको बन्धनसे छुड़ानेके लिये बलराम और श्रीकृष्णको वहाँ अवश्य चलना चाहिये।

जो अक्रूरद्वारा किये गये इस स्तोत्रका एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, वह पुत्रहीन हो तो पुत्र पाता है और भार्याहीन हो तो उसे प्रिय भार्याकी उपलब्धि होती है। निर्धनको धन, भूमिहीनको उर्वरा भूमि, संतानहीनको संतान और प्रतिष्ठाहीनको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होती है और जो यशस्वी नहीं है, वह भी अनायास ही महान् यश प्राप्त कर लेता है।

तदनन्तर अक्रूरजी रातके समय अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो रमणीय चम्पाकी शय्यापर श्रीकृष्णको छातीसे लगाकर सोये। प्रातःकाल सहसा उठकर परम उत्तम आह्निक कृत्यका सम्पादन करके उन्होंने जगदीश्वर श्रीकृष्ण तथा बलरामको अपने रथपर बिठाया। पाँच प्रकारके गव्य (दूध, दही, माखन, घी और छाँछ) तथा नाना प्रकारके परम दुर्लभ द्रव्य रखवाये। वृषभानु, नन्द, सुनन्द तथा चन्द्रभानु गोपको भी साथ ले लिया। उस समय व्रजराज नन्द गोपने आनन्दमग्न हो नाना प्रकारके वाद्य—मृदङ्ग, मुरज (ढोल), पटह, पणव, ढक्का, दुन्दुभि, आनक, सज्जा, संनहनी, कांस्य-पट्ट (झाँझ), मर्दल और मण्डवी आदि बजवाये। बाजोंकी ध्वनि और बलराम तथा श्रीकृष्णके जानेका समाचार सुन श्रीकृष्णको रथपर बैठे देख गोपियाँ प्रणय-कोपसे पीड़ित हो उनके पास आ पहुँचीं। ब्रह्मन्! श्रीकृष्णके मना करनेपर भी श्रीराधाकी प्रेरणासे उन गोपकिशोरियोंने पैरोंके आघातसे राजा कंसके उस रथको अनायास ही तोड़ डाला। उसपर बैठे हुए सब गोप हाहाकार


*नमः कारणरूपाय परमात्मस्वरूपिणे। सर्वेषामपि विश्वानामीश्वराय नमो नमः॥
पराय प्रकृतेरीश परात्परतराय च। निर्गुणाय निरीहाय नीरूपाय स्वरूपिणे॥
सर्वदेवस्वरूपाय सर्वदेवेश्वराय च। सर्वदेवाधिदेवाय विश्वादिभूतरूपिणे॥
असंख्येषु च विश्वेषु ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः। स्वरूपायादिबीजाय तदीशविश्वरूपिणे॥
नमो गोपाङ्गनेशाय गणेशेश्वररूपिणे। नमः सुरगणेशाय राधेशाय नमो नमः॥
राधारमणरूपाय राधारूपधराय च। राधाराध्याय राधायाः प्राणाधिकतराय च॥
राधासाध्याय राधाधिदेवप्रियतमाय च। राधाप्राणाधिदेवाय विश्वरूपाय ते नमः॥
वेदस्तुतात्मवेदङ्गरूपिणे वेदिने नमः। वेदाधिष्ठातृदेवाय वेदबीजाय ते नमः॥
यस्य लोमसु विश्वानि चासंख्यानि च नित्यशः। महद्विष्णोरीश्वराय विश्वेशाय नमो नमः॥
स्वयं प्रकृतिरूपाय प्राकृताय नमो नमः। प्रकृतीश्वररूपाय प्रधानपुरुषाय च॥
(७०। ५६—६५)