भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 688, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 688

६७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण तथा पार्वतीकी प्रतिमाओंमें जीव-चैतन्यका न्यास करके उनका पूजन करता है, जो शिव और दुर्गाके तथा विशेषतः मेरे लिये मन्दिरका निर्माण करता और उन मन्दिरोंमें शिव आदिकी प्रतिमाको स्थापित करता है; वह अपने जन्मको सफल बना लेता है। जो पुष्पोद्यान, शंकु, सेतु, खात (कुआँ आदि) और सरोवरका निर्माण तथा ब्राह्मणको स्थान एवं वृत्ति देकर उसकी स्थापना करता है; उसका जन्म सफल हो जाता है। पिताजी ! ब्राह्मणकी स्थापना करनेसे जो फल होता है; उसे वेद, पुराण, संत, मुनि और देवता भी नहीं जानते। धरतीपर जो धूलिके कण हैं, वे गिने जा सकते हैं; वर्षाकी बूँदें भी गिनी जा सकती हैं; परंतु ब्राह्मणको वृत्ति और स्थान देकर बसा देनेमें जो पुण्यफल होता है; उसकी गणना विधाता भी नहीं कर सकते। ब्राह्मणको जीविका देकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है, सुस्थिर सम्पत्ति पाता है और परलोकमें चारों प्रकारकी मुक्तियोंका भागी होता है। वह मेरी दास्य-भक्तिको पा लेता और वैकुण्ठमें चिरकालतक आनन्द भोगता है। मुझ परमात्माकी तरह उसका भी कभी वहाँसे पतन नहीं होता। जो उत्तम, अनाथ, दरिद्र और पूर्णतः पण्डित ब्राह्मणको सुपात्र देख उसका विवाह कर देता है; उसे निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति होती है। छत्र, चरणपादुका, शालग्राम तथा कन्याके दानका फल पृथ्वीदानके समान माना गया है। हाथीका दान करनेपर उसके रोएँके बराबर वर्षोंतक स्वर्गकी प्राप्ति होती है; यह शास्त्रमें प्रसिद्ध है। गजराजके दानका फल इससे चौगुना माना गया है। श्वेत घोड़ेके दानका पुण्य गजदानसे आधा बताया गया है और अन्य घोड़ोंके दानका फल श्वेत घोड़ेके दानकी अपेक्षा आधा कहा गया है। काली गौके दानका फल गजदानके ही तुल्य है। धेनुदानका फल भी वैसा ही है। सामान्य गोदानका फल उससे आधा कहा गया है। बछड़ा व्यायी हुई गौके दानसे भूमिदानका फल प्राप्त होता है। ब्राह्मणको भोजन कराया जाय तो उससे सम्पूर्ण दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। अन्नदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा। उसमें पात्रकी परीक्षा आवश्यक नहीं है - अन्नदान पानेके सभी अधिकारी हैं। अन्नदानके लिये कहीं किसी कालका भी नियम नहीं है - भूखेको सदा ही अन्न दिया जा सकता है। अन्नदानसे दाताको सतत पुण्यफलकी प्राप्ति होती है और उसे लेनेवाले पात्र (व्यक्ति)-को भी प्रतिग्रहका दोष नहीं लगता। भूतलपर अन्नदान धन्य है, जो वैकुण्ठकी प्राप्तिका हेतु होता है*। जो दरिद्र एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको वस्त्र देता है, उसे शुभ फलकी प्राप्ति होती है। लोहेके दीपमें सोनेकी बत्ती रखकर जो परमात्मा श्रीहरिके लिये घृतसहित उस दीपका दान करता है; वह मेरे धाममें जाता है। फूलकी माला, फल, शय्या, गृह और अन्नके दानसे शुभ फलकी प्राप्ति होती है। इन सभी दानोंसे दीर्घकालतकके लिये श्रेष्ठ लोक प्राप्त होते हैं। यदि इन दानोंका निष्काम भावसे अनुष्ठान हो तो इनसे भगवत्प्राप्ति भी हो सकती है। ब्रजराज ! तुम व्रजभूमिमें जाकर प्रत्येक व्रजमें ब्राह्मणोंको भोजन कराओ। यह मैंने तुम्हें पुण्यवर्धक दानका परिचय दिया है। नीच पुरुषोंके प्रति इसका वर्णन नहीं करना चाहिये। (अध्याय ७६)

  • अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति । नात्र पात्रपरीक्षा सा न कालनियमः क्वचित् । अन्नदाने शुभं पुण्यं धातुः पात्रं त्वपातकी ॥ अन्नदानं च धन्यं स्याद्भूभौ वैकुण्ठहेतुकम् । (७६ । ६४-६५१/२)