भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 694
६८४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

इनकी ओर कुदृष्टि नहीं डालते। विद्वान् पुरुष ग्रहणके समय सूर्य और चन्द्रमाको नहीं देखते। प्रथम, अष्टम, सप्तम, द्वादश, नवम और दशम स्थानमें सूर्य हों तो सूर्यका तथा जन्म-नक्षत्रमें और अष्टम एवं चतुर्थ स्थानमें चन्द्रमा हों तो चन्द्रमाका दर्शन नहीं करना चाहिये। भाद्रपदमासके शुक्ल और कृष्णपक्षकी चतुर्थीको उदित हुए चन्द्रमाको नष्टचन्द्र कहा गया है; अतः उसका दर्शन नहीं करना चाहिये। मनीषी पुरुषोंने ऐसे चन्द्रमाका परित्याग किया है। तात! यदि कोई उस दिन जान-बूझकर चन्द्रमाको देखता है तो वह उसे अत्यन्त दुष्कर कलङ्क देता है। यदि कोई मनुष्य अनिच्छासे उक्त चतुर्थीके चन्द्रमाको देख ले तो उसे मन्त्रसे पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिये। ऐसा करनेसे वह तत्काल शुद्ध हो भूतलपर निष्कलङ्क बना रहता है। जलको पवित्र करनेका मन्त्र इस प्रकार है—

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥

'सुन्दर सलोने कुमार! इस मणिके लिये सिंहने प्रसेनको मारा है और जाम्बवान्‌ने उस सिंहका संहार किया है; अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमन्तकमणिपर तुम्हारा ही अधिकार है।'

इस मन्त्रसे पवित्र किया हुआ उत्तम जल अवश्य पीना चाहिये। तात! ये सारी बातें तुम्हें बतायी गयीं। अब तुमसे और क्या कहूँ?

(अध्याय ७८)


दुःस्वप्न, उनके फल तथा उनकी शान्तिके उपायका वर्णन

तदनन्तर सूर्यग्रहण-चन्द्रग्रहणादिके विषयमें कहकर नन्द बाबाके पूछनेपर भगवान् कहने लगे।

**श्रीभगवान् बोले—**नन्दजी! जो स्वप्नमें हर्षातिरेकसे अट्टहास करता है अथवा यदि विवाह और मनोऽनुकूल नाच-गान देखता है तो उसके लिये विपत्ति निश्चित है। स्वप्नमें जिसके दाँत तोड़े जाते हैं और वह उन्हें गिरते हुए देखता है तो उसके धनकी हानि होती है और उसे शारीरिक कष्ट भोगना पड़ता है। जो तेलसे स्नान करके गदहे, ऊँट और भैंसेपर सवार हो दक्षिण दिशाकी ओर जाता है; निःसंदेह उसकी मृत्यु हो जाती है। यदि स्वप्नमें कानमें लगे हुए अड़हुल, अशोक और करवीरके पुष्पको तथा तेल और नमकको देखता है तो उसे विपत्तिका सामना करना पड़ता है। नंगी, काली, नक-कटी, शूद्र-विधवा तथा जटा और ताड़के फलको देखकर मनुष्य शोकको प्राप्त होता है। स्वप्नमें कुपित हुए ब्राह्मण तथा क्रुद्ध हुई ब्राह्मणीको देखनेवाले मनुष्यपर निश्चय ही विपत्ति आती है और लक्ष्मी उसके घरसे चली जाती हैं। जंगली पुष्प, लाल फूल, भलीभाँति पुष्पोंसे लदा पलाश, कपास और सफेद वस्त्रको देखकर मनुष्य दुःखका भागी होता है। काला वस्त्र धारण करनेवाली काले रंगकी विधवा स्त्रीको हँसती और गाती हुई देखकर मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाता है। जिसे स्वप्नमें देवगण नाचते, गाते, हँसते, ताल ठोंकते और दौड़ते हुए दीख पड़ते हैं; उसका शरीर मृत्युका शिकार हो जायगा। जो स्वप्नमें काले पुष्पोंकी माला और कृष्णाङ्गरागसे सुशोभित एवं काला वस्त्र धारण करनेवाली स्त्रीका आलिङ्गन करता है; उसकी मृत्यु हो जायगी। जो स्वप्नमें मृगका मरा हुआ छौना, मनुष्यका मस्तक और हड्डियोंकी माला पाता है; उसके लिये विपत्ति निश्चित है। जो ऐसे रथपर, जिसमें गदहे और ऊँट जुते हुए हों, अकेले सवार होता है और उसपर बैठकर फिर जागता है तो निःसंदेह वह मौतका ग्रास बन जाता है। जो अपनेको हवि, दूध, मधु, मट्ठा और गुड़से सराबोर देखता है; वह निश्चय ही