ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण नन्दजी ! इस प्रकार तीन भेदोंवाली स्त्रीजातिकी कथा मैंने कह दी, अब विभिन्न प्रकारके भक्तोंका लक्षण सुनिये। तृणकी शय्याका प्रेमी भक्त सांसारिक सुखोंके कारणोंका त्याग करके अपने मनको मेरे नाम और गुणके कीर्तनमें लगाता है। वह मेरे चरणकमलका ध्यान करता है और भक्तिभावसहित उसका पूजन करता है। देवगण उस निष्काम भक्तकी अहैतुकी पूजाको ग्रहण करते हैं। ऐसे भक्त अणिमा आदि सारी अभीष्ट सिद्धियोंकी तथा सुखके कारणभूत ब्रह्मत्व, अमरत्व अथवा देवत्वकी कामना नहीं करते। उन्हें हरिकी दासताके बिना सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य आदि चारों मुक्तियोंकी अभिलाषा नहीं रहती और न वे निर्वाण-मुक्ति तथा अभीप्सित अमृत-पानकी ही स्पृहा करते हैं। उन्हें मेरी अतुलनीय निश्चल भक्तिकी ही लालसा रहती है। ब्रजेश्वर ! उन श्रेष्ठ सिद्धेश्वरोंमें स्त्री-पुरुषका भेद नहीं रहता और न समस्त जीवोंमें भिन्नता रहती है। वे दिगम्बर होकर भूख-प्यास आदि तथा निद्रा, लोभ, मोह आदि शत्रुओंका त्याग करके रात-दिन मेरे ध्यानमें निमग्न रहते हैं। नन्दजी ! यह मेरे सर्वश्रेष्ठ भक्तके लक्षण हैं। अब मध्यम आदि भक्तोंका लक्षण श्रवण करो। पूर्वजन्मोंके शुभ कर्मके प्रभावसे पवित्र हुआ गृहस्थ कर्मोंमें आसक्त न होकर सदा पूर्वकर्मका उच्छेदक कर्म ही करता है; वह यत्नपूर्वक कोई दूसरा कर्म नहीं करता; क्योंकि उसे किसी कर्मकी कामना ही नहीं रहती। वह मन, वाणी और कर्मसे सदा ऐसा चिन्तन करता रहता है कि जो कुछ कर्म है, वह सब श्रीकृष्णका है, मैं कर्मका कर्ता नहीं हूँ। ऐसा भक्त मध्यम श्रेणीका होता है। जो उससे भी नीची कोटिका है; वह श्रुतिमें प्राकृतिक अर्थात् अधम कहा गया है। उत्तम कोटिका भक्त अपने हजारों पूर्वपुरुषोंका उद्धार कर देता है। उसे स्वप्नमें भी यमराज अथवा यमदूतका दर्शन नहीं होता। मध्यम कोटिका भक्त अपनी सौ पीढ़ियोंका तथा प्राकृत भक्त पचीस पीढ़ियोंका उद्धारक होता है। तात ! इस प्रकार मैंने आपके आज्ञानुसार तीन प्रकारके भक्तोंका वर्णन कर दिया। अब सावधानतया ब्रह्माण्डकी रचनाका आख्यान श्रवण कीजिये। नन्दजी ! भक्तलोग यत्न करनेपर ब्रह्माण्ड- रचनाका प्रयोजन जान लेते हैं। मुनियों, देवताओं और संतोंको बड़े दुःखसे कुछ-कुछ ज्ञात होता है। पूर्णरूपसे विश्वका ज्ञान तो अनन्तस्वरूप मुझको, ब्रह्मा और महेश्वरको है। हमारे अतिरिक्त धर्म, सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, कपिल, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, वेद, वेदमाता सावित्री, स्वयं सर्वज्ञा राधिका-ये लोग भी विश्व-रचनाका अभिप्राय जानते हैं, इनके अतिरिक्त और किसीको पता नहीं है। उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न सभी विद्वान् इसके वैषम्यार्थको पूर्णरूपसे जाननेमें असमर्थ हैं। जैसे आकाश और आत्मा नित्य हैं; उसी प्रकार दसों दिशाएँ नित्य हैं। जैसे प्रकृति नित्य है, वैसे ही विश्वगोलक नित्य है। जैसे गोलोक नित्य है, उसी तरह वैकुण्ठ भी नित्य है। एक समयकी बात है। जब मैं गोलोकमें रास- क्रीड़ा कर रहा था, उसी समय मेरे वामाङ्गसे एक षोडशवर्षीया नारी प्रकट हुई। वह अत्यन्त सुन्दरी बाला रमणियोंमें सर्वश्रेष्ठ थी। उसके शरीरका रंग श्वेत चम्पकके समान गौर था। उसकी कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमाको लज्जित कर रही थी। वह रत्नाभरणोंसे भूषित थी और उसके अङ्गपर अग्निमें तपाकर शुद्ध की हुई साड़ी शोभा पा रही थी। उसके सभी अङ्ग मनोहर और कोमल थे तथा उसका प्रसन्नमुख मन्द-मन्द मुस्कानसे सुशोभित था। उसके चरणोंका अधोभाग सुन्दर महावरसे उद्भासित हो रहा था। वह सुन्दर नेत्रोंवाली सौन्दर्यशालिनी बाला गजेन्द्रकी-सी