भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 716

७०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मनुष्य विषमिश्रित भोजनको खा जाता है और दुष्ट मुखपर छलछलाते हुए दूधवाले दूषित विषकुम्भको ग्रहण कर लेता है; उसी तरह लम्पट पुरुष परायी स्त्रियोंके मनोहर मुखकमलको, जो विनाशका कारण है, देखकर मोहवश भ्रान्त हो जाता है। स्त्रियोंका सुन्दर मुख, दोनों नितम्ब तथा स्तन काम-वासनाके आधार, नाशके कारण और अधर्मके स्थान हैं। जो लार और मूत्रसे संयुक्त है, जिसमेंसे दुर्गन्ध निकलती है, जो पाप तथा यमदण्डका कारण है, स्त्रियोंका वह मूत्रस्थान (योनि) नरककुण्डके सदृश है। ब्राह्मण ! एकान्त देखकर जो तुम मेरी धर्षणा करना चाहते हो तो यहीं समस्त देवता, लोकपाल, कर्मोंके शासक तथा साक्षी जाज्वल्यमान धर्म, स्वयं श्रीहरिद्वारा नियुक्त दण्डकर्ता यमराज, स्वयं धर्मात्मा श्रीकृष्ण, ज्ञानरूपी महेश्वर, दुर्गा, बुद्धि, मन, ब्रह्मा, इन्द्रियाँ तथा देवगण उपस्थित हैं। ये सम्पूर्ण प्राणियोंमें उनके कर्मोंके साक्षीरूपसे वर्तमान रहते हैं; अतः अज्ञानी ब्राह्मण ! कौन-सा स्थान गुप्त है और कौन-सा रहस्यमय ? विप्र ! तुम्हारा कल्याण हो। मुझे क्षमा कर दो और जाओ। मैं तुम्हें भस्म कर डालनेमें समर्थ हूँ; परंतु ब्राह्मण अवध्य होते हैं। अतः वत्स ! तुम सुखपूर्वक यहाँसे चले जाओ। द्विज ! तपस्या करते हुए मुझे एक सौ आठ युग बीत गये। अब न तो मेरे पिताका गोत्र ही रह गया है और न मेरे माता- पिता ही हैं। सबके अन्तरात्मास्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण मेरी रक्षा करते हैं। श्रीकृष्णद्वारा स्थापित धर्म नित्य मेरी रक्षामें तत्पर है। सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, ब्रह्मा, शम्भु, भगवती दुर्गा-ये सभी सदा मेरी देख-भाल करते हैं। जिन्होंने हंसोंको श्वेत, शुकोंको हरा और मयूरोंको रंग-बिरंगा बनाया है; वे ही मेरी रक्षा करेंगे। सभी देवता अनाथों, बालकों तथा वृद्धोंकी सर्वदा रक्षा करते हैं, अतः नारी समझकर धर्म मेरा परित्याग करके नहीं जा सकते। इसके बाद श्रीवृन्दाने पतिव्रत-धर्मकी महिमा और दुराचारकी निन्दा करके कोपप्रकाशपूर्वक शाप दे दिया—'दुराचार ! तुम्हारा नाश हो जाय। पापिष्ठ ! तुम नष्ट हो जाओ।' इतना कहकर जब पुनः शाप देनेको उद्यत हुई तब स्वयं सूर्यने उसे यत्न करके रोक दिया। इसी बीच वहाँ ब्रह्मा, शिव, सूर्य और इन्द्र आदि देवता आ पहुँचे। सबने उससे क्षमा माँगी और 'धर्म तुम्हारी परीक्षाके लिये आया था। उसमें तनिक भी पापबुद्धि नहीं थी। धर्मके नाशसे जगत्के सनातनधर्म- रूप जीवनका नाश हो जायगा' यह कहकर धर्मको जीवनदान देनेकी प्रार्थना की। तब वृन्दाने कहा—देव! मैं नहीं जानती थी कि ये ब्राह्मणवेषधारी धर्म हैं और मेरी परीक्षा करनेके लिये आये हैं। इसी कारण मैंने क्रोधवश इनका नाश किया है। अब आप लोगोंकी कृपासे मैं अवश्य धर्मको जीवन-दान दूँगी। ब्रजेश्वर ! यों कहकर वह वृन्दा पुनः बोली—'यदि मेरी तपस्या सत्य हो तथा मेरा विष्णुपूजन सत्य हो तो उस पुण्यके प्रभावसे ये विप्रवर यहाँ शीघ्र ही दुःखरहित हो जायें। यदि मुझमें सत्य वर्तमान हो और मेरा व्रत सत्य तथा तप शुद्ध हो तो उस पुण्य तथा सत्यके प्रभावसे ये ब्राह्मण कष्टरहित हो जायें। यदि नित्यमूर्ति सर्वात्मा नारायण तथा ज्ञानात्मक शिव सत्य हैं तो ये द्विजवर संतापरहित हो जायें। यदि ब्रह्म सत्य हो, सभी देवता और परमा प्रकृति सत्य हों, यज्ञ सत्य हो और तप सत्य हो तो इन ब्राह्मणका कष्ट दूर हो जाय।'-इतना कहकर सती वृन्दाने धर्मको अपनी गोदमें कर लिया और उन कलारूपको देखकर वह कृपापरवश हो रुदन करने लगी। इसी बीच धर्मकी भार्या मूर्ति, जो शोकसे व्याकुल थी, सिरके बल विष्णुके चरणपर गिर पड़ी और यों बोली।