ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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प्रदान किया था। यहाँ भगवान् विष्णुके वेदवर्णित स्वरूपका ध्यान किया जाता है, जो सनातन एवं सबके लिये परम दुर्लभ है। पूर्वोक्त मूल मन्त्रसे उत्तम नैवेद्य आदि सभी उपचार समर्पित करने चाहिये। भगवान्का जो कवच है, वह अत्यन्त गुप्त है। उसे मैंने अपने पिताजीके मुखसे सुना था। विप्रवर! पूर्वकालमें त्रिशूलधारी भगवान् शंकरने ही पिताजीको गङ्गाके तटपर इसका उपदेश दिया था। भगवान् शंकरको, ब्रह्माजीको तथा धर्मको गोलोकके रासमण्डलमें गोपीवल्लभ श्रीकृष्णने कृपापूर्वक यह परम अद्भुत कवच प्रदान किया था।
ब्रह्मोवाच
राधाकान्त महाभाग कवचं यत् प्रकाशितम्।
ब्रह्माण्डपावनं नाम कृपया कथय प्रभो॥ १७॥
मां महेशं च धर्मं च भक्तं च भक्तवत्सल।
त्वत्प्रसादेन पुत्रेभ्यो दास्यामि भक्तिसंयुतः॥ १८॥
ब्रह्माजी बोले—महाभाग! राधाकान्त! प्रभो! ब्रह्माण्डपावन नामक जो कवच आपने प्रकाशित किया है, उसका उपदेश कृपापूर्वक मुझको, महादेवजीको तथा धर्मको दीजिये। भक्तवत्सल! हम तीनों आपके भक्त हैं। आपकी कृपासे मैं अपने पुत्रोंको भक्तिपूर्वक इसका उपदेश दूँगा॥ १७-१८॥
श्रीकृष्ण उवाच
शृणु वक्ष्यामि ब्रह्मोश धर्मेदं कवचं परम्।
अहं दास्यामि युष्मभ्यं गोपनीयं सुदुर्लभम्॥ १९॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं प्राणतुल्यं ममैव हि।
यत्तेजो मम देहेऽस्ति तत्तेजः कवचेऽपि च॥ २०॥
श्रीकृष्णने कहा—ब्रह्मन्! महेश्वर! और धर्म! तुमलोग सुनो! मैं इस उत्तम कवचका वर्णन कर रहा हूँ। यद्यपि यह परम दुर्लभ और गोपनीय है तथापि तुम्हें इसका उपदेश दूँगा। परंतु ध्यान रहे, जिस-किसीको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि यह मेरे लिये प्राणोंके समान है। जो तेज मेरे शरीरमें है, वही इस कवचमें भी है॥ १९-२०॥
कुरु सृष्टिमिमं धृत्वा धाता त्रिजगतां भव।
संहर्त्ता भव हे शम्भो मम तुल्यो भवे भव॥ २१॥
हे धर्म त्वमिमं धृत्वा भव साक्षी च कर्मणाम्।
तपसां फलदाता च यूयं भवत मद्गरात्॥ २२॥
ब्रह्मन्! तुम इस कवचको धारण करके सृष्टि करो और तीनों लोकोंके विधाताके पदपर प्रतिष्ठित रहो। शम्भो! तुम भी इस कवचको ग्रहण करके संहारका कार्य सम्पन्न करो और संसारमें मेरे समान शक्तिशाली हो जाओ। धर्म! तुम इस कवचको धारण करके कर्मोंके साक्षी बने रहो। तुम सब लोग मेरे वरसे तपस्याके फलदाता हो जाओ॥ २१-२२॥
ब्रह्माण्डपावनस्यास्य कवचस्य हरिः स्वयम्।
ऋषिश्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं जगदीश्वरः॥ २३॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः।
त्रिलक्षवारपठनात् सिद्धिदं कवचं विधे॥ २४॥
इस ब्रह्माण्डपावन कवचके स्वयं श्रीहरि ऋषि हैं, गायत्री छन्द हैं, मैं जगदीश्वर श्रीकृष्ण ही देवता हूँ तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग* कहा गया है। विधे! तीन लाख बार पाठ करनेपर यह कवच सिद्धिदायक होता है॥ २३-२४॥
यो भवेत् सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेत्तु सः।
तेजसा सिद्धियोगेन ज्ञानेन विक्रमेण च॥ २५॥
प्रणवो मे शिरः पातु नमो रासेश्वराय च।
भालं पायान्नेत्रयुग्मं नमो राधेश्वराय च॥ २६॥
कृष्णः पायाच्छ्रोत्रयुग्मं हे हरे घ्राणमेव च।
जिह्विकां वह्निजाया तु कृष्णायेति च सर्वतः॥ २७॥
* इस कवचका विनियोगवाक्य संस्कृतमें इस प्रकार है—
ॐ अस्य श्रीब्रह्माण्डपावनकवचस्य साक्षात् श्रीहरिः ऋषिः, गायत्री छन्दः, स एव जगदीश्वरः श्रीकृष्णो देवता धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः।