ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ७९
तीनों लोकोंपर विजय पा सकता है।
संसारपावनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः।
ऋषिश्च्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं च महेश्वरः।
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ४७ ॥
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धिदं कवचं भवेत् ॥ ४८ ॥
यो भवेत् सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेद् भुवि।
तेजसा सिद्धियोगेन तपसा विक्रमेण च ॥ ४९ ॥
शम्भुर्मे मस्तकं पातु मुखं पातु महेश्वरः।
दन्तपंक्तिं च नीलकण्ठोऽप्यधरोष्ठं हरः स्वयम् ॥ ५० ॥
कण्ठं पातु चन्द्रचूडः स्कन्धौ वृषभवाहनः।
वक्षःस्थलं नीलकण्ठः पातु पृष्ठं दिगम्बरः ॥ ५१ ॥
सर्वाङ्गं पातु विश्वेशः सर्वदिक्षु च सर्वदा।
स्वप्ने जागरणे चैव स्थाणुर्मां पातु संततम् ॥ ५२ ॥
इति ते कथितं बाण कवचं परमाद्भुतम्।
यस्मै कस्मै न दातव्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ५३ ॥
यत् फलं सर्वतीर्थानां स्नानेन लभते नरः।
तत् फलं लभते नूनं कवचस्यैव धारणात् ॥ ५४ ॥
इदं कवचमज्ञात्वा भजेन्मां यः सुमन्दधीः।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ ५५ ॥
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते संसारपावनं नाम शङ्करकवचं सम्पूर्णम्।
इस संसारपावन नामक शिवकवचके प्रजापति ऋषि, गायत्री छन्द तथा मैं महेश्वर देवता हूँ। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षके लिये इसका विनियोग है। (विनियोग-वाक्य यों समझना चाहिये—'ॐ अस्य श्रीसंसारपावननामधेयस्य शिवकवचस्य प्रजापतिर्ऋषिर्गायत्री छन्दो महेश्वरो देवता धर्मार्थकाममोक्षसिद्धौ विनियोगः।') पाँच लाख बार पाठ करनेसे यह कवच सिद्धिदायक होता है। जो इस कवचको सिद्ध कर लेता है, वह तेज, सिद्धियोग, तपस्या और बल-पराक्रममें इस भूतलपर मेरे समान हो जाता है ॥ ४७—४९ ॥
शम्भु मेरे मस्तककी और महेश्वर मुखकी रक्षा करें। नीलकण्ठ दाँतोंकी पाँतका और स्वयं हर अधरोष्ठका पालन करें। चन्द्रचूड कण्ठकी और वृषभवाहन दोनों कंधोंकी रक्षा करें। नीलकण्ठ वक्षःस्थलका और दिगम्बर पृष्ठभागका पालन करें। विश्वेश सदा सब दिशाओंमें सम्पूर्ण अङ्गोंकी रक्षा करें। सोते और जागते समय स्थाणुदेव निरन्तर मेरा पालन करते रहें ॥ ५०—५२ ॥
बाण! इस प्रकार मैंने तुमसे इस परम अद्भुत कवचका वर्णन किया। इसका उपदेश जो ही आवे, उसीको नहीं देना चाहिये, अपितु प्रयत्नपूर्वक इसको गुप्त रखना चाहिये। मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नान करके जिस फलको पाता है, उसको अवश्य इस कवचको धारण करनेमात्रसे पा लेता है। जो अत्यन्त मन्दबुद्धि मानव इस कवचको जाने बिना मेरा भजन करता है, वह सौ लाख बार जप करे तो भी उसका मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता ॥ ५३—५५ ॥
इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणमें संसारपावन नामक कवच पूरा हुआ।
सौति कहते हैं—शौनक! यह तो कवच कहा गया। अब स्तोत्र सुनिये। मन्त्रराज कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसे पूर्वकालमें वसिष्ठजीने दिया था।
ॐ नमः शिवाय
बाणासुर उवाच
वन्दे सुराणां सारं च सुरेशं नीललोहितम्।
योगीश्वरं योगबीजं योगिनां च गुरोर्गुरुम् ॥ ५६ ॥
ज्ञानानन्दं ज्ञानरूपं ज्ञानबीजं सनातनम्।
तपसां फलदातारं दातारं सर्वसम्पदाम् ॥ ५७ ॥
तपोरूपं तपोबीजं तपोधनधनं वरम्।
वरं वरेण्यं वरदमीड्यं सिद्धगणैर्वरैः ॥ ५८ ॥
कारणं भुक्तिमुक्तीनां नरकार्णवतारणम्।
आशुतोषं प्रसन्नास्यं करुणामयसागरम् ॥ ५९ ॥
हिमचन्दनकुन्देन्दुकुमुदाम्भोजसंनिभम् ।
ब्रह्मज्योतिःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् ॥ ६० ॥
विषयाणां विभेदेन विभ्रतं बहुरूपकम्।
जलरूपमग्निरूपमाकाशरूपमीश्वरम् ॥ ६१ ॥
वायुरूपं चन्द्ररूपं सूर्यरूपं महत्प्रभुम्।
आत्मनः स्वपदं दातुं समर्थमवलीलया ॥ ६२ ॥