ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ८५
है। अब फिर तुझे उसका दर्शन नहीं हो सकता; क्योंकि जिनके अन्तःकरणकी वासना परिपक्व नहीं हुई है, ऐसे कुयोगियोंको उस स्वरूपका दर्शन होना अत्यन्त कठिन है। तेरे इस शरीरका अन्त होनेपर जब तुझे दिव्य शरीर प्राप्त होगा, तब तू पुनः जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाले गोविन्दका दर्शन करेगा।'
यह सुनकर वह बालक बड़ी प्रसन्नताके साथ पुनः ध्यानके प्रयाससे विरत हो गया। उसने समय आनेपर मन-ही-मन श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए तीर्थभूमिमें अपने शरीरको त्याग दिया। उस समय स्वर्गलोकमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। आकाशसे पृथ्वीपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। इस प्रकार महामुनि नारद शापमुक्त हो गये। गोप-शरीरका त्याग करके वह जीव ब्रह्म-विग्रहमें विलीन हो गया। वह नित्यस्वरूप तो है ही, पूर्वकालमें उसका आविर्भाव हुआ और भिन्न कालमें वह तिरोहित हो गया। नित्यरूपधारी जो भक्तजन हैं, उनका अपनी इच्छासे आविर्भाव अथवा तिरोभाव होता है। उन्हें जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका स्पर्श नहीं होता।
(अध्याय २०-२१)
ब्रह्माजीके पुत्रोंके नामोंकी व्युत्पत्ति
सौति कहते हैं— शौनकजी ! तदनन्तर कुछ कल्प व्यतीत होनेपर जब ब्रह्माजी पुनः सृष्टि-कार्यमें संलग्न हुए, तब उनके 'नरद' नामक कण्ठदेशसे मरीचि आदि मुनियोंके साथ वे शापमुक्त मुनि प्रकट हुए। इसी कारणसे उन मुनीन्द्रकी 'नारद' नामसे ख्याति हुई। ब्रह्माजीका जो पुत्र उनके चेतस् (चित्त)-से प्रकट हुआ, उसका नाम उन्होंने 'प्रचेता' रखा। जो उनके दक्षिण पार्श्वसे सहसा उत्पन्न हुआ, वह सब कर्मोंमें दक्ष होनेके कारण 'दक्ष' कहलाया। वेदोंमें कर्दम शब्द छायाके अर्थमें विद्यमान है। जो बालक ब्रह्माजीके कर्दम अर्थात् छायासे प्रकट हुआ, उसका नाम 'कर्दम' रखा गया। इसी तरह मरीचि शब्द वेदोंमें तेजोभेदके अर्थमें आता है। अतः जो बालक तत्काल अत्यन्त तेजस्वी रूपमें प्रकट हुआ, वह 'मरीचि' कहलाया। जिस बालकने जन्मान्तरमें ऋतुसंघ (यज्ञसमूह)-का सम्पादन किया था, वह वर्तमान जन्ममें ब्रह्माजीका पुत्र होनेपर भी उसी ऋतुके नामपर 'ऋतु' कहलाया। ब्रह्माजीका मुख प्रधान अङ्ग है। उस अङ्गसे उत्पन्न हुआ बालक इर अर्थात् तेजस्वी था, इसलिये 'अङ्गिरा' नामसे प्रसिद्ध हुआ। शौनक! भृगु शब्द अत्यन्त तेजस्वीके अर्थमें विद्यमान है। ब्रह्माजीसे उत्पन्न जो बालक अत्यन्त तेजस्वी हुआ, उसका नाम 'भृगु' हुआ। जो बालक होनेपर भी तत्काल अत्यन्त तेजके कारण अरुण वर्णका हो गया और उच्च कोटिकी तपस्याके कारण तेजसे प्रज्वलित होने लगा, वह 'अरुण' नामसे विख्यात हुआ। जिस योगीके योगबलसे हंस उसके अधीन रहते थे, वह परम