ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 195, कुल 380 में से
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- ७—धर्म तथा धन का सन्धय करते रहना ।
- ८—अधर्ममूलक व्यवसाय में कभी न लिपटना ।
- ९—क्रोध, मोह, लोभ, भोग और दुर्घ से दूर ही रहना ।
- १०—गृहस्थाश्रम को नियत समय तक सुखमय बनाते रहना ।
२५—विवाह-विधान
“ब्रह्मचर्यं समाप्याथ, गृहधर्मं समाचरेत् ।”
ब्रह्मचर्याश्रम को समाप्त कर गृहस्थ-धर्म का पालन करना योग्य है ।
उद्धेत द्विजोभायां, सवर्णं लक्षणन्विताम् ।”
(मनुस्मृति)
स्नातक को चाहिये कि सवर्णों और मुलच्छियों वाली कन्या से विवाह करे ।
ब्रह्मचारी वीर्य-रक्षण सहित ज्ञानार्जन कर लेने पर, गुरु की आज्ञा से स्नातक होकर घर आता है । उस अवस्था में उसके पिता या उसके समान अधिकारी उसका सत्कार करते हैं । इसके अनन्तर विवाह का समय आता है । वर अपने सम्बन्धियों के साथ कन्या के पिता के यहाँ पहुँचता है । कन्या-पक्ष से उसका द्वार—पूजन (स्वागत) होता है, तदनन्तर ‘जनवास’ दिया जाता है । विवाह के विशिष्ट समय पर वर विवाह-मण्डप में जाता है । कन्या का पिता उसका ‘मनुषक’ अर्थात् उत्तम पदार्थों से सत्कार कर बैठता है । फिर अभिदेव का स्थापन कर वर, वधू का पाणि-भरण कर इस प्रकार कहता है—