भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 380 में से

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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शास्त्र-आज्ञा देता है। फिर भी अयोग्य पुरुष और अयोग्य स्त्री को तो मैथुन की आज्ञा ही नहीं है। शास्त्रों में कहे गये नियमों के अनुकूल गृहस्थाश्रम में ब्रह्मचर्य के पालन से मनुष्य की शारीरिक तथा मानसिक किसी प्रकार की हानि नहीं होती। गृहस्थ ब्रह्मचारी भी विद्वान्, श्रीमान् और कीर्तिमान् हो सकता है।

२७—सदाचार की सौ शिष्टाग्यें

अब हम इस शीर्षक के नीचे उन शिष्टाग्यों को देते हैं, जिन का पालन करने से गृहस्थाश्रम सुखमय बनाया जा सकता है:—

१—जो परमात्मा को सर्वदर्शी और अपने हृदय में रहने-वाला समझता है, वह पाप नहीं करता।

२—अभिमान करनेवाला पुरुष बहुत थोड़े दिनों में नाश को प्राप्त होता है।

३—इश्वर केवल हमारे सुकर्मों में सहायता करता है। वह किसी के कुकर्म का सहजी नहीं।

४—वह परमेश्वर सब निराशों की आशा है। इसलिये उसे किसी भी अवस्था में भूलना योग्य नहीं।

५—जिसके हृदय में सद्भावना है, वह पुरुष कभी दुःखी नहीं हो सकता।

६—मानसिक ऊष्णरणयें ही हमारे पतनका कारण बनती हैं।

७—जो कार्य जितनी ही दृढ़ता और सुचारुता से किया जाता है, उसमें उतनी ही सफलता भी मिलती है।

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