ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें२५३
वीर्य का स्थान और परिमाण
जैसे दूध में घी और ईल में रस गुप्त रूप से ( दिखलाई नहीं पड़ता ) रहता है, उसी प्रकार प्राणियों के शरीर भर में वीर्य भी रहता है।
वास्तव में मनुष्य-शरीर में वीर्य के लिये कोई नियत स्थान नहीं है। यह सर्वत्र में व्याप्त है। जिस अन्त से वीर्य की सचा छू जाती है, वह शून्य हो जाता है। यदि वीर्य एक स्थान पर रहने वाला पदार्थ होता, तो इसके संरक्षण या नाश का मला-बुरा प्रभाव क्या सच अज्ञों पर न पड़ता ?
पृथक् स्वप्नसूक्तं प्रोक्तमोजोमस्तिभक्तैरत्नसाम् । द्वावरुजली तु स्तन्त्यस्य, चत्वारो रजसखियाः ॥
( बृहद वाग्भट्ट )
ओज, मस्तिष्क और वीर्य का मान पुरुष के अपने एक पसरा ( चुल्हा ) के बराबर होता है। और स्त्रियों के दूध का परिमाण दो अँजुली तथा रज का चार अँजुली है।
ऊपर दिया हुआ वीर्य और रज का परिमाण, स्वस्थ पुरुष और स्त्रियों का समझना चाहिये। अस्वस्थ पुरुष और स्त्रियों में रज का परिमाण इतना नहीं हो सकता।
कुछ लोगों का मत है कि ४० कवर आहार से १ बिन्दु रक्त और ४० बिन्दु रक्त से १ बिन्दु वीर्य उत्पन्न होता है।
हमारे देश के कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि १ तोला वीर्य के लिये १ सेर रक्त और १ सेर रक्त के लिये १ मन आहार की आवश्यकता होती है।
अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि वीर्य का प्रभाव