भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम की तपश्चर्या ] [ १४१

ग्रीष्मे पंचाग्निमध्यस्थः श्चचारैवं तपश्चिरम् ।
रिपून्निर्जित्य कामादीनूर्मिष्ट्कं विधूय च ॥३२
द्वंद्वैरनुद्वेजितधीस्तापदोषैरनाकुलः ।
यमैः सनियमैश्चैव शुद्धदेहः समाहितः ॥३३
वशीचकार पवनं प्राणायामेन देहगम् ।
जितपद्मासनो मौनी स्थिरचित्तो महामुनिः ॥३४
वशीचकार चाक्षाणि प्रत्याहारपरायणः ।
धारणाभिः स्थिरीचक्रे मनश्चंचलमात्मवान् ॥३५

ऐसे अनेक परम मनोरथ दृश्यों से परिपूर्ण उस हिमवान् गिरि पर एक आश्रम अपना बनाकर मतिमानों में परमश्रेष्ठ राम ने तपस्या करने का मन में विचार किया था और वह तपश्चर्या करने के लिये शाकों तथा मूलों के आहार करने वाला होकर नियत इन्द्रियों वाला बन गया था ।२६। उसने देवेश भगवान् शङ्कर को अपने मन में विनिवेशित करके तपस्या की थी । भृगुमुनि ने जो भी मार्ग बताया था उसी के अनुसार वह परमाधिक भक्ति से युक्त हो गया था ।३०। हे नृप ! उसने एक निष्ठ मन से देवेश्वर की पूजा की थी । वर्षा काल में भी वह बिना कहीं पर आश्रय ग्रहण किये हुए खुले में तप करने लगा था और शिशिर ऋतु में भी जल में स्थित रहा करता ।३१। ग्रीष्म में पाँच अग्नियों के मध्य में बैठा रहता था । इस रीति से राम ने तप किया था और चिरकाल वह तपश्चर्या की थी । जिसमें षट् ऊर्मियों का विधूनन करके काम क्रोध-लोभ-मोह आदि शत्रुओं को भली भाँति जीत लिया था ।३२। जितने भी शीत-उष्ण आदि द्वन्द्व हैं इनसे उसकी बुद्धि उद्वेजित नहीं होती थी और वह ताप के दोषों से कभी व्याकुल भी नहीं होता था । यमों और नियमों के द्वारा उसका देह परम शुद्ध था तथा वह बहुत ही समाहित रहता था ।३३। उसके देह में जो वायु था उसको उसने प्राणायामों के द्वारा अपने वश में कर लिया था । वह महान् मुनि मौनधारी-पद्मासन को जीत लेने वाला और परम स्थिर चित्त वाला था ।३४। प्रत्याहार में तत्पर रहकर उसने अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया था । आत्मवान् उस राम ने धारणाओं के द्वारा परम चञ्चल तथा प्रमथन शील बलवान् मन को भी स्थिर कर लिया था जो कभी भी साधारण या काबू में नहीं आया करता है ।३५।