संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स ध्यायमानोऽपि न चाजगाम दत्तो मनोगोचरमस्य राजन् ॥४४ तपस्विनो दांततमस्य साधोरनागसो दुष्कृतिकारिणो विभुः । एवं यदात्रे स्तनयो महात्मा दृष्टो न ध्यानपथे नृपेण ॥४५ तदाऽतिदुःखेन विदूयमानः शोकेन मोहेन युतो बभूव । तं शोकमग्नं नृपति महात्मा रामो जगादाखिलचित्तदर्शी ॥४६ मा शोकभावं नृपते प्रयाहि नैवानुशोचंति महानुभावाः । यस्ते वरायाभवमादिसर्गे स एव चाहं तव सादनाम ॥४७ समागतस्त्वं भव धीरचित्तः संग्रामकाले न विषादचर्चा । सर्वो हि लोकः स्वकृतं भुनक्ति शुभाशुभं दैतकृतं विपाके ॥४८ अन्यो न कोऽप्यस्य शुभाशुभस्य विपर्ययं कर्तुमलं नरेश । यत्तौ सुपुण्यं बहुजन्मसंचितं तेनेहं दत्तस्य वराहंपात्रम् ॥४६
जिस दत्तात्रेय के प्रभाव एवं अनुग्रह से मैंने इतना अधिक अनुपम ओज प्राप्त किया था कि उससे मैंने समस्त लोकपालों का भी तिरस्कार कर दिया था ओर वे भी मेरे सामने नहीं पड़ते थे। जिस समय में यह यह महापुरुष मेरे हृदय में विराजमान थे वे महानुभाव भी अब मेरे हृदय का त्याग करके प्रयाण कर गये हैं क्योंकि उस समय में उनके भी दर्शन नहीं हो रहे थे ।४३। वह राजा कात्र्तवीर्य बहुत ही अधिक खिन्न हो गया था और बार-बार ध्यान करता था। हे राजन् ! बहुत ही अच्छी तरह से ध्यान किये गये भी वे दत्तात्रेय इस राजा के मन में गोचर नहीं हुए थे ।४४। दत्तात्रेय मुनि उसके ध्यान में इसीलिए समागत नहीं हुए थे क्योंकि वे तो विभु थे और यह जानते थे कि यह परमाधिक दमन शील-तपस्वी-निरपराध साधु जमदग्नि के साथ भी इसने परम-दुष्कृत किया है। इसी कारण से राजा के द्वारा बार-बार ध्यान करने पर भी महान् आत्मा वाले अत्रि के पुत्र उसके ध्यान में नहीं आये थे और उस राजा को उनका दर्शन प्राप्त नहीं हुआ था ।४५। उस समय में यह कात्र्तवीर्य अत्यधिक दुःख से