भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६७

शरणं भव नो ब्रह्मन्नार्त्तानामभयैषिणाम् । सगरास्त्राग्निानिर्दग्धशरीराणां मुमूर्षताम् ।।३१ स हन्त्यस्मानशेषेण वैरांतकरणोन्मुखः । तस्माद्भयाद्धि निष्क्रांता वयं जीवितकांक्षिणः ।।३२ विभिन्नराज्यभोगर्द्धिस्र्वदारापत्यबांधवाः । केवलं प्राणरक्षार्थं त्वां स्वयं शरणं गतः ।।३३ न ह्यन्योऽस्ति पुमाँल्लोके सौहृदेन बलेन वा । यस्तं निवर्त्तयित्वास्मान्पालयेन्महतो भयात् ।।३४ त्वं किलाक्र्कान्वयभुवां राज्ञां कुलगुरुवृतः । तद्वंशपूर्वजे भूपैस्त्वत्प्रभावश्च तादृशः ।।३५

समस्त शत्रुओं के कुलों का पूर्णतया क्षय करने को दीक्षा ग्रहण करने वाले उस राजा को देखकर डरे हुए सब शत्रुगण स्त्री और बच्चों को आगे करके अपने प्राणों की रक्षा के लिए सगर नृप की शरणागति में आ गये। इक्ष्वाकु के वंशजों के कुलगुरु वसिष्ठजी के चारों ओर वे सात राजाओं के कुलों में परम प्रसिद्ध समुत्पन्न हुए पारद और वह्लव आदि सगर के शत्रु राजा उपस्थित हुए थे ।२९। वसिष्ठजी के समीप में ही ऋषियों से घिरे हुए निवास कर रहे थे। वहाँ पर उन सबने उपगत होकर हाथ जोड़कर उनसे कहा था ।३०। हे ब्रह्मन् आप ही हमारे रक्षा करने वाले होंवे। हम बहुत ही आर्त्त हैं और अभय दान के इच्छुक हैं। हम सब राजा सगर के अस्त्र को अग्नि से निर्दग्ध शरीर वाले हैं और मर रहे हैं ।३१। वह राजा सगर तो अपने वैर का अन्त करने के लिए उन्मुख हो रहा है और हम सबको ही मार रहा है। उसी के भय से हम निकलकर भागे हुए हैं और अपने जीवन की रक्षा के चाहने वाले हैं ।३२। हमारा सबका राज्य-भोग-समृद्धि-स्त्री-सन्तति और बान्धव सभी कुछ विभिन्न हो गया है। अब तो हम केवल अपने प्राणों की रक्षा के लिए आपको शरणागति में आये हैं ।३३। इस लोक में आपके सिवाय अन्य कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है जो सौहार्द से तथा बल-विक्रम से उसको हटाकर इस महान भय से हमारी रक्षा कर सके ।३४। आप तो निश्चित रूप से सूर्य वंश के भूपों के कुलगुरु माने गये हैं और उस राजा के वंश में जो भी पूर्वज हुए थे उन सबने आपको कुलगुरु बनाया है और इन सब पर भी आपका प्रभाव उसी प्रकार का है ।३५।