भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रक्रिया, अनुषंग, उपोद्घात और उपसंहार। इन्हीं के द्वारा सम्पूर्ण वर्णन हुआ है।

इस पुराण के नामकरण का रहस्य है कि इसमें समस्त ब्रह्मांड का वर्णन है। भुवन कोष का उल्लेख तो सभी पुराणों में मिलता है परन्तु प्रस्तुत पुराण में सारे विश्व का सांगोपांग वर्णन उपलब्ध होता है। इसमें विश्व के भूगोल का विस्तृत व रोचक विवेचन है। इसमें ऐसी-ऐसी जानकारी मिलती है जिसे देखकर आश्चर्य होता है कि बिना वैज्ञानिक सहयोग के इतनी गहन खोज कैसे की होगी। वैज्ञानिक युग में अभी तक उसकी पुष्टि भी नहीं हो पायी है।

पुराण में स्वायम्भुव मनु के सर्ग व भारत आदि सब वर्षों की समस्त नदियों का वर्णन है। फिर सहस्रों द्वीपों के भेदों का सात द्वीपों में ही अन्तर्भाव हैं, जम्बूद्वीप और समुद्र के मण्डल का विस्तार से वर्णन है। पर्वतों का योजना-बद्ध उल्लेख है। जम्बूद्वीप आदि सात समुद्रों के द्वारा घिरे हुए हैं। सप्तद्वीप का प्रमाण सहित वर्णन है। सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी को पूर्ण परिणाम बताया गया है। सूर्य की गति का भी उल्लेख है। ग्रहों की गति और परिमाण भी कहे गये हैं। इस तरह से विश्व के भूगोल का महत्वपूर्ण उल्लेख है।

वेद के सम्बन्ध में भी यह जानकारी उल्लेखनीय है कि विभु बुद्धिमान गीर्ण स्कन्ध ने सन्तान के हेतु से एक वेद के चार पाद किये थे और ईश्वर ने चार प्रकार से किया था। भगवान शिव के अनुग्रह से व्यास देव ने उसी भाँति भेद किया था। उस वेद की शिष्यों और प्रशिष्यों ने वेद की अयुत शाखाएं की थीं।

इस पुराण के विषय में एक विशेष बात यह है कि ईसवी सन् ५ की शताब्दी में इस पुराण को ब्राह्मण लोग जावा द्वीप ले गये थे। वहाँ की प्राचीन "कवि भाषा" में अनुवाद हुआ जो आज भी मिलता है। इससे इस पुराण की प्राचीनता का भी बोध होता है।