संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 421, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८ )
चारों युगों के विस्तृत वर्णन से आश्चर्य तो होता ही है, साथ ही ऋषियों की प्रतिभा का भी आभास होता है। रौरव आदि नरकों के वर्णन से सभी प्राणियों के पापों के परिणामों का निर्णय किया गया है। इससे पाठक को अपने कर्मों की समीक्षा करके जीवन मार्ग को नये ढङ्ग से निर्धारित करने की प्रेरणा मिलती है।
पुराण को साहित्य की दृष्टि से भी उत्कृष्ट माना जाता है क्योंकि निबन्ध ग्रन्थों में इसके श्लोक दिखाई देते हैं। मिताक्षरा अपरार्क, स्मृति चन्द्रिका, कल्पतरु में इसके श्लोक उद्धृत किये गये हैं। इससे लगता है साहित्यकारों की दृष्टि में यह पुराण उच्च महत्व का है। कालिदास की रचनाओं का और उनकी वैदर्भी रीति का प्रभाव भी इस पुराण के विवेचन पर है। इतिहास कारों का मत है कि पुराण की रचना गुप्तोत्तर युग में अर्थात् ६०० ईस्वी में मानना उचित है।
—चमनलाल गौतम