संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकपिल आश्रम में अश्वानयन ] [ ३७
कपिल आश्रम में अश्वानयन
जैमिनिरुवाच-
क्रोधाग्निमेनं विप्रेन्द्र सद्यः संहत्तुमहंसि ।
नो चेदकाले लोकोऽयं सकलस्तेन दह्यते ॥१
दृष्टस्ते महिमानेन व्याप्तमासीच्चराचरम् ।
क्षमस्व संहर क्रोधं नमस्ते विप्रपुंगव ॥२
एवं संस्तूयमानस्तु भगवान्कपिलो मुनिः ।
तूर्णमेव क्षयं निन्ये क्रोधाग्निमतिभैरवम् ॥३
ततः प्रशांतमभवज्जगत्सर्वं चराचरम् ।
देवास्तपस्विनश्चैव बभूवुर्विगतज्वराः ॥४
एतस्मिन्नेव काले तु भगवान्नारदो मुनिः ।
अयोध्यामगमद्राजन्देवलोकाद्यदृच्छया ॥५
तमागतमभिप्रेक्ष्य नारदं सगरस्तदा ।
अर्घ्यपाद्यादिभिः सम्यक्पूजयामास शास्त्रतः ॥६
परिगृह्य च तत्पूजामासीनः परमासने ।
नारदो राजशार्दूलमिदं वचनमब्रवीत् ॥७
जैमिनी मुनि ने कहा—देवों ने कपिल मुनि से प्रार्थना की थी—विप्रेन्द्र ! आप इस क्रोध की महान् भीषण अग्नि का तुरन्त ही संहार करने के योग्य हैं । यदि इसका संहरण नहीं किया गया तो उससे अकाल में ही यह सम्पूर्ण लोक दाह को प्राप्त होता जा रहा है ।१। आपकी महिमा तो इसी से देखी जा चुकी है जो कि इस चराचर में व्याप्त थी । हे विप्रों में परम श्रेष्ठ ! अब क्षमा कीजिए और अपने क्रोध का संहरण कीजिए । आपकी सेवा में हम सबका प्रणाम है ।२। इस रीति से जब देवों के द्वारा उनकी स्तुति की गयी थी तो भगवान कपिल मुनि ने उस अत्यधिक भैरव क्रोधाग्नि का क्षय कर दिया था ।३। फिर यह समस्त चराचर जगत् प्रशान्त हो गया था और सब देवगण तथा तपस्वी गण दुःख से रहित हो गये थे अर्थात् इन सबका सन्ताप दूर हो गया था ।४। इसी समय में देवर्षि भगवान्