भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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ब्रह्माण्डवर्तं वर्णन ] [ १३१

प्रवृत्तिकाले रजसाभिपन्नो महत्वभूतादिविशेषतां च ।
विशेषतां चेंद्रियतां च याति गुणावसानौषधिभिर्मनुष्यः ॥२४
सत्याभिध्यायिनस्तस्य ध्यायिनः सन्निमित्तकम् ।
रजः सत्त्वतमौव्यक्ता विधुर्माणः परस्परम् ॥२५
आद्यंतं वै प्रपत्स्यंते क्षेत्रमज्ञाम्बु सर्वशः ।
संसिद्धकार्यकरणा उत्पद्यंतेऽभिमानिनः ॥२६
सर्वे सत्त्वाः प्रपद्यंते ह्यव्यक्तात्पूर्वमेव च ।
प्राक्सृतौ ये त्वसुवहाः साधकाश्चाप्यसाधकाः ॥२७
असंशांतास्तु ते सर्वे स्थानप्रकरणैः सह ।
कार्याणि प्रतित्स्यंते उत्पत्स्यन्ते पुनः पुनः ॥२८

उस समय में अबुद्धि पूर्वक युक्त है और अशक्त पर हैं यह प्रत्यय रहित और अमोघ हैं और जल में मछली के ही समान स्थित हैं ।२२। पूर्व में वे दोनों ही पूर्व की प्रवृत्ति वाले हैं फिर सर्व को प्राप्त हो जायगा । जो अज्ञ हैं वे रज-सत्व और तम नामों वाले गुणों से प्रवृत्त हुआ करते हैं ।२३। यह मनुष्य प्रवृत्ति के समय से रजोगुण से अभिपन्न होता है और महत्वभूत आदि की विशेषता और इन्द्रियतता की विशेषता को गुणामुखी के और निमित्तों के साथ ध्यायी के ये रज-सत्व और तम पर स्वर में विधर्मी होते हुए व्यक्त होते हैं ।२४-२५। आद्यन्त सभी ओर अज्ञाम्बु क्षेत्र में प्राप्त हो जायँगे । फिर संसिद्ध कार्य और करण वाले अभिमानी उत्पन्न हुआ करते हैं ।२६। सभी सत्व अव्यक्त से पूर्व ही प्रसन्न होते हैं । पूर्व में होने वाली सृत्ति में जो भी प्राणधारी हैं वे चाहे साधक होवे या असाधक होवे ।२७। वे सभी स्थान प्रकरणों के साथ असंशान्त हैं । वे सब कार्यों को प्राप्त करेंगे और बार-बार उत्पन्न होंगे ।२८।

गुणमात्रात्मकावेव धर्माधमौ परस्परम् ।
आरप्सेते हि चान्योन्यं वरेणानुग्रहेण वा ॥२९
शवस्तुल्यप्रसृष्टश्च सर्गादौ याति विक्रियाम् ।
गुणास्तं प्रतिधीर्यते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥३०