भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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ब्रह्माण्डवर्त वर्णन ] [ १३३

युगपत्संप्रवर्त्तन्ते भूतान्येवेंद्रियाणि च ॥३७
भूतभेदाश्च भूतेभ्य इति सर्गः प्रवर्त्तते ।
विस्तरावयबस्तेषां यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
कीर्त्तितो वा यथापूर्वं तथैवाप्युपधार्यताम् ॥३८
एतच्छ्रुत्वा नैमिषेयास्तदानीं लोकोत्पत्ति सुस्थितिं
चाप्ययं च ।
तस्मिन्सत्रेऽवभृथं प्राप्य शुद्धाः पुण्यं लोकमृषयः
प्राप्नुवंति ॥३९
यथा यूयं विधिना देवतादीनिष्ट्वा चैवावभृथं प्राप्य शुद्धाः ।
त्यक्त्वा देहानायुषोऽन्ते कृतार्थाः पुण्यं लोकं प्राप्य
मोदध्वमेवम् ॥४०
एते ते नैमिषेया वै दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च वै तदा ।
जग्मुश्चावभृथस्नाताः स्वर्गं सर्वे तु सत्त्रिणः ॥४१
विप्रास्तथा यूयमपि इष्ट्वा बहुविधैर्मखैः ।
आयुषोऽन्ते ततः स्वर्गं गंतारः स्थ द्विजोत्तमाः ॥४२

वे ही फिर सम्मान करने वाला ब्रह्म के नाम वाले हो जाते हैं । और फिर यही ब्रह्माजी अभिमान और गुणात्मक लोकों का सृजन करते हैं ।३६। महत् तत्व से अहंकार की उत्पत्ति होती है और फिर अहंकार से भूतों का उद्भव हुआ करता है । ये भूत और इन्द्रियां एक ही साथ सम्प्रवृत्त हुआ करते हैं ।३७। इन भूतों से अन्य भूतों के भेद होते हैं—इस तरह से सर्ग प्रवृत्त हुआ करता है । उनका विस्तार और अवयव जैसी प्रज्ञा है और जैसा भी सुना है मैंने आपको पूर्व में बता दिया है उसी प्रकार से इनका अवधारण आप कर लीजिये ।३८। इसको नैमिष क्षेत्र में रहने वालों ने श्रवण करके जो उस समय में लोकों की उत्पत्ति और संहार कहा गया था उस सबमें अवभृथ को प्राप्त करके शुद्ध हुए ऋषिगण—पुण्य लोक को प्राप्त हो जाते हैं ।३९। जिस रीति से आप लोग विधि पूर्वक यजन करके और देव आदि का अर्चन करके तथा अवभृथ को प्राप्त करके शुद्ध हुए हो । फिर आयु के समाप्त होने पर शरीरों का त्याग करके कृतार्थ हुई हैं और