संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्तेयपान वर्णन ] [ १५५
इन्द्र देव ने कहा—हे भगवन् ! आपने हिंसादि का सम्पूर्ण लक्षण बता दिया है। अब स्तेय का क्या लक्षण है—यह भी आप मेरे सामने विस्तार के साथ वर्णन कीजिए ।१। समस्त पापों में अधिक पाप जीव जातियों का हनन करना ही होता है। इससे भी अधिक पाप उसके हनन करने का होता है जो विश्वस्त होवे तथा शरण में समागत हो गया हो ।२। विश्वास देकर पापिष्ठ शूद्र वा अन्त्य जातिज हो जो उसका हनन करता है वह ब्रह्म हत्या से भी अधिक पाप होता है जिसका कोई भी प्रायश्चित्त ही नहीं होता है ।३। जो ब्रह्मज्ञ हो—दरिद्र हो और बड़ी ही कठिनाई से जिसने धन का अर्जन किया हो तथा बहुत पुत्रों और कलत्र वाला हो एवं उसी धन से जो जीवित रहने की इच्छा रखता हो उसके द्रव्य की चोरी इतना महान दोष होता है कि फिर उसका कोई भी प्रायश्चित्त नहीं होता है ।४। जो विश्वस्त हो उसके द्रव्य के हरण करने का पाप उससे भी अधिक होता है। विश्वस्त हो अथवा अविश्वस्त हो दरिद्र के धन का हरण कभी नहीं करना चाहिए ।५। देवों और द्विजातियों के सुवर्ण तथा रत्नों के अपहरण करने वाले को जो बिना ही विचार किये मार डालता है उसको अश्वमेध यज्ञ का पुण्य-फल प्राप्त होता है ।६। गुरु-देव-द्विज-पुत्र-और आत्म सुख के धन की चोरी करता है उसका अधःक्रम से ही दश गुना उत्तर अघ होता है ।७।
अन्त्यजात्पादजाद्वैश्यात्क्षत्रियाद्ब्राह्मणादपि । दशोत्तरगुणैः पापैर्लिप्यते धनहारकः ॥८ अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । रहस्यातिरहस्यं च सर्वपापप्रणाशनम् ॥९ पुरा कांचीपुरे जातो वज्राख्यो नाम चोरकः । तस्मिन्पुरवरे रम्ये सर्वैश्वर्यसमन्विताः । सर्वे नीरोगिणो दांताः सुखिनो दययांचिताः ॥१० सर्वैश्वर्यसमृद्धेऽस्मिन्नगरे स तु तस्करः । स्तोकास्तोकक्रमेणैव बहुद्रव्यमपाहरत् ॥११ तदरण्येऽवटं कृत्वा स्थापयामास लोभतः । तद्गोपनं निशार्धायं तस्मिन्दूरं गते सति ॥१२ किरातः कश्चिदागत्य तं दृष्ट्वा तु दशांशतः । जहाराविदितस्तेन काष्ठभारं वहन्ययौ ॥१३