संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमृत मंथन वर्णन ] [ १६३
भगवांस्तद्वचः श्रुत्वा मुनेरमिततेजसः ।
प्रहृष्टो भाविकार्यज्ञस्तूष्णीमेव तदा ययौ ॥२६
एतावंतमिमं कालं त्रिलोकीं पालयन्भवान् ।
ऐश्वर्यमदमत्तत्वात्कैलासाद्रिमपीडयत् ॥३०
सर्वज्ञेन शिवेनाथ प्रेषितो भगवान्मुनिः ।
दुर्वासास्त्वन्मदभ्रंशं कर्त्तुकामा शशाप ह ॥३१
एकमेव फलं जातमुभयोः शापयोरपि ।
अधुना पश्यनिःश्रीकं त्रैलोक्यं समजायत ॥३२
न यज्ञाः संप्रवर्त्तंते न दानानि च वासव ।
न यमा नापि नियमा न तपांसि च कुत्रचित् ॥३३
विप्राः सर्वेऽपि निःश्रीका लोभोपहतचेतसः ।
निःसत्वा धैर्यहीनाश्च नास्तिकाः प्रायशोऽभवन् ॥३४
निरोषधिरसा भूमिर्निीवीर्या जायतेतराम् ।
भास्करो धूसराकारश्चन्द्रमाः कांतिवर्जितः ॥३५
उन अपरिमित तेज वाले मुनि के इस वचन का श्रवण करके भगवान उस समय में चुप चाप ही वहाँ से चले गये थे क्योंकि ये तो आगे होने वाले कार्य का ज्ञान रखने वाले थे।२६। आप इतने समय तक त्रिलोकी का पालन करते हुए ऐश्वर्य के मद से मत्तता होने के कारण से आपने कैलाश पर्वत को पीड़ित किया था।३०। इसके अनन्तर सर्वज्ञ भगवान शिव ने भगवान मुनि को भेजा था। दुर्वासा जी ने आपके मद को भ्रंश करने की ही इच्छा से शाप दिया था।३१। इन दोनों शापों का एक फल हुआ है। अब देखिए यह त्रैलोक्य श्री से रहित हो गया।३२। हे वासव ! न तो अब यज्ञ संप्रवृत्त हो हो रहे हैं और न दान ही दिये जा रहे हैं और इस समय में तो कहीं पर भी यम-नियम और तपश्चर्या कुछ भी नहीं हैं।३३। सभी विप्र श्री से रहित हैं और इनके हृदय में लोभ ऐसा बैठ गया है कि इनका चित्त उपहत सा हो गया है। इनमें सत्व नाम मात्र को भी नहीं है—ये धैर्य से हीन हो गये हैं तथा बहुधा ये सब नास्तिक हो गये हैं। जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते हैं वे नास्तिक होते हैं।३४। यह