भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 575

अमृत मंथन वर्णन ] [ १६५

किया था ॥४०॥ विशेष रूप से जो रत्नों के समान अप्सराएँ थीं उनका हरण कर लिया था। इसके उपरान्त सभी देवगण बहुत ही बाधित कर दिए थे ॥४१॥ उस प्रकार का जो बड़ा भारी शोर हुआ था उसको सुनकर इन्द्र ने अपना आसन त्याग दिया था और सब देवों के साथ में वहाँ से भाग जाने में तत्पर हो गया था ॥४२॥

ब्राह्मं धाम समभ्येत्य विषण्णवदनो वृषा ।
यथावत्कथयामास निखिलं दैत्यचेष्टितम् ॥४३
विधातापि तदाकर्ण्य सर्वदेवसमन्वितम् ।
हतश्रीकं हरिहयमालोक्येदमुवाच ह ॥४४
इन्द्रत्वमखिलैर्देवैर्मु कुन्दं शरणं व्रज ।
दैत्यारातिर्जगत्कर्ता स ते श्रेयो विधास्यति ॥४५
इत्युक्तवा तेन सहितः स्वयं ब्रह्मा पितामहः ।
समस्तदेवसहितः क्षीरोदधिमुपाययौ ॥४६
अथ ब्रह्मादयो देवा भगवन्तं जनार्दनम् ।
तुष्टुवुर्वाग्विरिष्ठाभिः सर्वलोकमहेश्वरम् ॥४७
अथ प्रसन्नो भगवान्वासुदेवः सनातनः ।
जगाद सकलान्देवाञ्जगद्रक्षणलंपटः ॥४८
श्रीभगवानुवाच-
भवतां सुविधास्यामि तेजसंवोपबृंहणम् ।
यदुच्यते मयेदानीं युष्माभिस्तद्विधीयताम् ॥४६

ब्रह्माजी के धाम में जाकर विषाद से युक्त मुख वाले इन्द्र ने जो कुछ भी दैत्यों ने किया था वह सभी ज्यों का त्यों कह दिया था ॥४३॥ विधाता भी उसको सुनकर सब देवों के सहित और हतश्री वाले हरिहय को देखकर यह बोले थे ॥४४॥ हे इन्द्र ! अब आप सब देवों के साथ भगवान् मुकुन्द की शरण में चले जाओ। वही दैत्यों के विनाशक और इस जगत के कर्त्ता हैं और वही तुम्हारा कल्याण करेंगे ॥४५॥ इतना कहकर पितामह ब्रह्माजी उसके तथा समस्त देवों के सहित क्षीर सागर में गये थे ॥४६॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा आदि देवों ने भगवान् जनार्दन की जो सब लोकों के महेश्वर हैं बहुत