संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमृत मंथन वर्णन ] [ १६७
सम्पन्न कराने के लिए कहना चाहिए। यह उन्हें बताओ कि इसके करने से जो भी कुछ फल होगा वह तो हम और आपको सभी को सामान्य ही होगा अर्थात् उसको हम और आप सभी प्राप्त करेंगे ।५२। इस क्षीरसागर के मन्थन किये जाने पर जो सुधा उत्पन्न होगी उस अमृत के पान करने से आप लोग बलशाली और न मरण वाले हो जाओगे ।५३। जिस प्रकार से ये दैत्यगण उस अमृत को किञ्चिन मात्र भी न प्राप्त कर पावेंगे और केवल मन्थन करने में क्लेश वाले ही होंगे उस प्रकार का उपाय तो मैं कर दूँगा ।५४। यह भगवान् वासुदेव के द्वारा समस्त सुरगणों में कहा गया था तब सब सुरगणों ने उन अतुल दैत्यों के साथ सन्धि की थी। फिर अनेक प्रकार की औषधियाँ सुरो और असुरों ने एकत्रित करके वहाँ पर प्राप्त की थी ।५५। उस क्षीर सागर के जल में डालकर चन्द्रमा से भी अधिक निर्मल मन्दराचल को मन्थन करने का साधन और वासुकि सर्प को उसको डोरी बनाया था। फिर सभी ने मिल-जुलकर क्षीर सागर के मन्थन करने का कार्य बड़े ही प्रबल प्रयत्न से प्रारम्भ कर दिया था ।५६।
वासुकेः पुच्छभागे तु सहिताः सर्वदेवताः ।
शिरोभागे तु दैतेया नियुक्तास्तत्र शौरिणा ॥५७
बलवंतोऽपि ते दैत्यास्तन्मुखोच्छ्वासपावकैः ।
निर्दग्धवपुषः सर्वे निस्तेजस्कास्तदाभवन् ॥५८
पुच्छदेशे तु कर्षंतो महूराप्यायिताः सुराः ।
अनुकूलेन वातेन विष्णुना प्रेरितेन तु ॥५६
आदिकूर्मकृतिः श्रीमान्मध्ये क्षीरपयोनिधेः ।
भ्रमतो मंदराद्रेस्तु तस्याधिष्ठानतामगात् ॥६०
मध्ये च सर्वदेवानां रूपेणान्येन माधवः ।
चकर्ष वासुकिं वेगाद्दैत्यमध्ये परेण च ॥६१
ब्रह्मरूपेण तं शैलं विधायाक्रांतवारिधिम् ।
अपरेण च देवर्षिर्महता तेजसा मुहुः ॥६२
उपबृंहितवान्देवान्येन ते बलशालिनः ।
तेजसा पुनरन्येन बलात्कारसहेन सः ॥६३