संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअमृत मंथन वर्णन ] [ १६६
सुराग्रहणतोऽप्येते सुरशब्देन कीर्तिताः ॥६६ मथ्यमाने ततो भूयः पारिजातो महाद्रुमः । आविरासीत्सुगंधेन परितो वासयञ्जगत् ॥७०
सर्वशक्ति शाली जनार्दन प्रभु ने उस नाग वासुकि की भी शक्ति का वर्धन किया था। फिर देवों और दानवों के द्वारा क्षीरसागर के मन्थन किये जाने पर ।६४। फिर आगे अर्थात् सबसे पूर्व सुरों की पूजित सुरभि प्राविर्भूत हुई थी। हे तपोधन ! उसका अवलोकन करके उस समय में देवगण और दैत्यगण सभी प्रसन्नता से भर गये थे ।६५। फिर उस क्षीर सागर के मन्थन करने पर जो कि देवों और दानवों के द्वारा किया गया था, उस समय में सिद्धगण यही चिन्तन कर रहे थे कि यह क्या वस्तु है ।६६। तब उस क्षीर सागर से वारुणी देवी उत्थित हुई थी जिसके मद के कारण परम चञ्चल नेत्र थे। वह असुरों के आगे मुस्कुराती हुई संस्थित हो गयी थी ।६७। दैत्यों ने उसका ग्रहण नहीं किया था। तभी से वे असुर हो गये थे क्योंकि सुरा ग्रहण करने वाले नहीं हुए थे जिनके पास सुरा नहीं है उसी से वे असुर शब्द से कहे गये थे ।६८। इसके पश्चात् वह समस्त देवों के सामने स्थित हो गयी थी। परमेष्ठी के द्वारा संकेतित होकर उन देवों ने बड़े ही आनन्द के साथ उसको ग्रहण कर लिया था। सुरा के ही ग्रहण करने से ये लोग सुर शब्द से कीर्त्तित हुए थे ।६९। फिर मन्थन किये जाने पर महान् द्रुम परिजात प्रकट हुआ था जो अपनी सुगन्ध से सम्पूर्ण जगत् को सुवासित कर रहा था ।७०।
अत्यर्थसुन्दराकारा धीराश्चाप्सरसां गणाः । आविर्भूताश्च देवर्षे सर्वलोकमनोहराः ॥७१ ततः शीतांशुमद्भूतं जग्राह महेश्वरः । विषजातं तदुत्पन्नं जगृहुर्नागजातयः ॥७२ कौस्तुभाख्यं ततो रत्नमाददे तज्जनार्दनः । ततः स्वपत्रगन्धेन मदयंती महौषधीः । विजया नाम संजज्ञे भैरवस्तामुपाददे ॥७३ ततो दिव्यांबरधरो देवो धन्वंतरिः स्वयम् । उपस्थितः करे बिभ्रदमृताढ्यं कमंडलुम् ॥७४