भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तन्निवारणसिद्ध्यर्थं ललिता परमेश्वरी ।
नामत्रयमहामन्त्रमहास्त्रं सा मुमोच ह ॥७०॥

भंड ने दृष्टि के विनाशक अन्धास्त्र का प्रहार किया था। देवी ने चाक्षुष्मन्महास्त्र के द्वारा उसका शमन कर दिया था ।६४। उस महाररण में भंड ने शक्ति नाशक नाम वाले अस्त्र को छोड़ा था उसका दर्प विश्वावसु अस्त्र के प्रयोग से दूर कर दिया था ।६५। भंड दानव ने अन्तकास्त्र को छोड़ा था और बहुत क्रोधित हुआ था। उसके बल को देवी ने महामृत्युञ्जयास्त्र से दूर कर दिया था ।६६। फिर भंड ने सब अस्त्रों की स्मृति के विनाश करने वाले अस्त्र को छोड़ा था, चक्रेशी ने धारणास्त्र के द्वारा उसका विनाश कर दिया था ।६७। शक्तियों को भय देने वाले भयास्त्र का प्रयोग भंड ने किया था और जगदम्बिका ने अभयंकर ऐन्द्रास्त्र को छोड़ दिया था ।६८। दानव ने शक्तिसेनाओं में महारोगास्त्र छोड़ दिया था जिससे राजयक्ष्मा आदि सहस्रों रोग होते थे । उसके निवारण की सिद्धि के लिए परमेश्वरी ललितादेवी ने नाम त्रय महामन्त्र महास्त्र का प्रयोग किया था । ।६६-७०।

अच्युतश्चाप्यनंतश्च गोविन्दस्तु शरोत्थिताः ।
हुंकारमात्रतो दग्ध्वा रोगांस्ताननयन्मुदम् ॥७१

नत्वा च तां महेशानीं तद्भक्तव्याधिमर्दनम् ।
विधातुं त्रिषु लोकेषु नियुक्ताः स्वपदं ययुः ॥७२

आयुर्नाशनमस्त्रं तु मुक्तवान्भंडदानवः ।
कालसंकर्षणीरूपमस्त्रं राज्ञी व्यमुञ्चत ॥७३

महासुरास्त्रमुद्दामं व्यसृजद्भंडदानवः ।
ततः सहस्रशो जाता महाकाया महाबलाः ॥७४

मधुश्च कैटभश्चैव महिषासुर एव च ।
धूम्रलोचनदैत्यश्च चंडमुण्डादयोऽसुराः ॥७५

चिक्षुभश्चामरश्चैव रक्तबीजोऽसुरस्तथा ।
शुम्भश्चैव निशुम्भश्च कालकेया महाबलाः ॥७६