भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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९० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्मे जो यह कहा है कि 'असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत।' (२ । ७) अर्थात् 'पहले यह असत् ही था। इसीसे सत् उत्पन्न हुआ।' यहाँ 'असत्' शब्द अभाव या मिथ्याका वाचक नहीं है; क्योकि पहले अनुवाकमे ब्रह्मका लक्षण बताते हुए उसे सत्य, ज्ञान और अनन्त कहा गया है। फिर उसीसे आकाश आदिके क्रमसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है। तदनन्तर छठे अनुवाकमे 'सोऽकामयत' के 'सः' पदसे उसी पूर्वानुवाकमे वर्णित ब्रह्मका आकर्षण किया गया है। तत्पश्चात् अन्तमे कहा गया है कि 'यह जो कुछ है, वह सत्य ही है—सत्यस्वरूप ब्रह्म ही है।' उसके बाद इसी विषयमे प्रमाणरूपमें श्लोक कहनेकी प्रतिज्ञा करके सातवे अनुवाकमे, 'असद् वा इदमग्र आसीत्' इत्यादि मन्त्र प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार पूर्वापर-प्रसङ्गको देखते हुए इस मन्त्रमे आया हुआ 'असत्' शब्द मिथ्या या अभावका वाचक सिद्ध नहीं होता; अतः वहाँ 'असत्'का अर्थ 'अप्रकट ब्रह्म' और उससे होनेवाले 'सत्' का अर्थ जगत् रूपमे 'प्रकट ब्रह्म' ही होगा। इसलिये यहाँ अर्थान्तरकी कल्पना अनावश्यक है। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद्मे भी जो यह कहा गया है कि 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदवेदमग्र आसीत्।' (छा० उ० ३।१९।१) अर्थात् 'आदित्य ब्रह्म है, यह उपदेश है, उसीका यह विस्तार है। पहले यह असत् ही था।' इत्यादि। यहाँ भी तैत्तिरीयोपनिषद्की भाँति 'असत्' शब्द 'अप्रकट ब्रह्म'का ही वाचक है; क्योंकि इसी मन्त्रके अगले वाक्यमे 'तत्सदासीत्' कहकर उसका 'सत्' नामसे भी वर्णन आया है। इसके सिवा, बृहदारण्यको- पनिषद्मे स्पष्ट ही 'असत्'के स्थानमे 'अव्याकृत' शब्दका प्रयोग किया गया है। (बृह० उ० '१ । ४ । ७) जो कि 'अप्रकट'का ही पर्याय है। अतः सब जगह पूर्वापरके प्रसङ्गमे कहे हुए शब्दो या वाक्योंका आकर्षण करके अन्वय करनेपर यही निश्चय होता है कि जगत्के कारणरूपसे भिन्न-भिन्न नामोंद्वारा उस पूर्णब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। प्रकृति या प्रधानकी सार्थकता परमात्माकी एक शक्ति माननेसे ही हो सकती है; उनसे भिन्न स्वतन्त्र पदार्थान्तर माननेसे नहीं। सम्बन्ध—ब्रह्म ही संपूर्ण जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है, जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं हो सकती। यह दृढ़ करनेके लिये सूत्रकार कौषीतकि- उपनिषद्के प्रसङ्गपर विचार करते हुए कहते हैं—