ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—उक्त मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार कहते हैं— साक्षाच्चोभयाम्नानात् ॥ १ । ४ । २५ ॥ साक्षात्=श्रुति साक्षात् अपने वचनोंद्वारा; च=भी; उभयाम्नानात्= ब्रह्मके उभय ( उपादान और निमित्त ) कारण होनेकी बात दुहराती है, इससे भी ( ब्रह्म ही उपादान कारण सिद्ध होता है, प्रकृति नहीं ) । व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद्मे इस प्रकार वर्णन आता है—‘एक समय कुछ महर्षि यह विचार करनेके लिये एकत्र हुए कि जगत्का कारण कौन है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं ? किससे जी रहे हैं ? हमारी स्थिति कहाँ है ? हमारा अधिष्ठाता कौन है ? कौन हमें नियमपूर्वक सुख-दुःखमे नियुक्त करता है ? उन्होने सोचा, कोई कालको, कोई स्वभावको, कोई कर्मको, कोई होनहार- को, कोई पाँचो महाभूतोंको, कोई उनके समुदायको कारण मानते हैं, इनमे ठीक-ठीक कारण कौन है ? यह निश्चय करना चाहिये । फिर उनके मनमे यह विचार उठा कि इनमेसे एक या इनका समुदाय जगत्का कारण नहीं हो सकता; क्योकि ये चेतनके अधीन हैं, स्वतन्त्र नहीं है । तथा जीवात्मा भी कारण नहीं हो सकता; क्योकि वह सुख-दुःखका भोक्ता और पराधीन है ।* फिर उन्होने ध्यानयोगमे स्थित होकर उस परमदेव परमेश्वरकी अपने गुणोंसे छिपी हुई अपनी ही स्वरूपभूता शक्तिका दर्शन किया; जो परमेश्वर अकेला ही पूर्वोक्त कालसे लेकर आत्मातक समस्त कारणोंपर शासन करता है ।† उपर्युक्त वर्णनमे स्पष्ट ही उस परमात्माको सबका उपादान कारण और सञ्चालक ( निमित्त कारण ) बताया है । इसके सिवा, इसी उपनिषद्के २ । १६ मे तथा दूसरे-दूसरे उपनिषदोमे भी जगह-जगह उस परमात्माको सर्वरूप कहा है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ही इस जगत्का उपादान और निमित्त कारण है ।
- किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च सम्प्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावादात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ ( श्वेता० १ । १-२ ) † यह मन्त्र पृष्ठ ८० मे आ गया है ।