भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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·१०० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ -विक्षेप करते है; उनके इस शक्तिविक्षेपसे ही विचित्र जगत्का प्रादुर्भाव स्वतः होने लगता है। अतः यही समझना चाहिये कि निर्विकार एकरस परमात्मा अपने स्वरूपसे अच्युत एवं अविकृत रहते हुए ही अपनी अचिन्त्य शक्तियोंद्वारा जगत्के रूपमें प्रकट हो जाते हैं; अतः उनका कर्ता और कर्म होना-उपादान एवं निमित्त कारण होना सर्वथा सुसंगत है। सम्बन्ध-इसीके समर्थनमें सूत्रकार दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं- योनिश्च हि गीयते ॥ १ । ४ । २८ ॥ हि=क्योंकि; योनिः = (वेदान्तमे ब्रह्मको) योनि; च=भी; गीयते=कहा जाता है ( इसलिये ब्रह्म ही उपादान कारण है ) । व्याख्या-'योनि'का अर्थ उपादान कारण होता है। उपनिषदोंमे अनेक स्थलोंपर परब्रह्म परमात्माको 'योनि' कहा गया है; जैसे-'कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्' ( मु० उ० ३ । १ । ३ ) अर्थात् 'जो सबके कर्ता, सबके शासक तथा ब्रह्माजीकी भी योनि ( उपादान कारण ) परम पुरुषको देखता है।' 'भूत- योनिं परिपश्यन्ति धीराः' (मु० उ० १ । १ । ६)-'उस समस्त प्राणियों- की योनि (उपादान कारण) को ज्ञानीजन सर्वत्र परिपूर्ण देखते है।' इस प्रकार स्पष्ट शब्दोंमे परब्रह्म परमात्माको समस्त भूत-प्राणियोंकी 'योनि' बताया गया है; इसलिये वही सम्पूर्ण जगत्का उपादान कारण है। 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते 'च' (मु० उ० १ । १ । ७) इत्यादि मन्त्रके द्वारा यह बताया गया है कि 'जैसे मकड़ी अपने शरीरसे ही जालेको बनाती और फिर उसीमे निगल लेती है, 'उसी प्रकार अक्षरब्रह्मसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता है।' इसके अनुसार भी यही सिद्ध होता है कि एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का निमित्त और उपादान कारण है। अतः यह समस्त चराचर विश्व भगवान्‌का ही स्वरूप है। ऐसा समझकर मनुष्यको उनके भजन-स्मरणमें लग जाना चाहिये; और सबके साथ व्यवहार करते समय भी इस बातको सदा ध्यानमें रखना चाहिये। सम्बन्ध-इस प्रकार अपने मतकी स्थापना और अपनेसे विरुद्ध मतोंका खण्डन करनेके पश्चात् इस अध्यायके अन्तमें सूत्रकार कहते हैं-