भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र १०—१३ ] अध्याय २ १०९ कोई स्थिरता या समाप्ति नहीं है, यह कहना ठीक है, तथापि दूसरे प्रकारसे अनुमानके द्वारा कारणतत्त्वका निश्चय करना चाहिये, ऐसा कोई कहे तो ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसी स्थितिमे वेदप्रमाणरहित कोई भी अनुमान वास्तविक ज्ञान करानेवाला सिद्ध नहीं होगा । अतएव उसके द्वारा तत्त्वज्ञान होना असम्भव है और तत्त्वज्ञानके बिना मोक्ष नहीं हो सकता। अतः सांख्य-मतमे ससारसे मोक्ष न होनेका प्रसङ्ग आ जायगा । सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकारसे प्रधानकारणवादका खण्डन करके उन्हीं युक्तियोंसे अन्य वेदविरुद्ध मतोंका भी निराकरण हो जाता है, ऐसा कहते हैं— एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ॥ २ । १ । १२ ॥ एतेन = इस पूर्वनिरूपित सिद्धान्तमे; शिष्टापरिग्रहाः = शिष्ट पुरुषोद्वारा अस्वीकृत अन्य सब मतोंका; अपि = भी; व्याख्याताः = प्रतिवाद कर दिया गया । व्याख्या—पाँचवें सूत्रसे ग्यारहवे सूत्रतक जो सांख्यमतावलम्बियोंद्वारा उपस्थित की हुई शङ्काओंका निराकरण करके वैदिक सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया है; इसीसे दूसरे मत-मतान्तरोंका भी, जो वेदानुकूल न होनेके कारण शिष्ट पुरुषोंको मान्य नहीं है, निराकरण हो गया । क्योकि उनके मत भी इस विषयमे सांख्यमतसे ही मिलते-जुलते हैं। सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें प्रधानकारणवादका निराकरण किया गया। अब ब्रह्मकारणवादमे दूसरे प्रकारके दोषोंकी उद्भावना करके उनका निवारण किया जाता है— भोक्त्रापत्तेरविभागश्चेत् स्याल्लोकवत् ॥ २ । १ । १३ ॥ चेत् = यदि कहो; भोक्त्रापत्तेः = ( ब्रह्मको जगत्का कारण माननेसे उसमें ) भोक्तापनका प्रसङ्ग आ जायगा, इसलिये; अविभागः = जीव और ईश्वरका विभाग सिद्ध नहीं होगा, उसी प्रकार जीव और जड-वर्गका भी परस्पर विभाग सिद्ध नहीं होगा; ( इति न = ) तो यह कहना ठीक नहीं है; लोकवत् = क्योंकि लोकमें जैसे विभाग देखा जाता है, वैसे; स्यात् = हो सकता है। व्याख्या—यदि कहो कि 'ब्रह्मको जगत्का कारण मान लेनेसे स्वयं ब्रह्मका ही जीवके रूपमें कर्म-फलरूप सुख-दुःख आदिका भोक्ता होना सिद्ध हो जायगा; इससे जीव और ईश्वरका विभाग सम्भव नहीं रहेगा तथा जडवर्गमे भोक्तापन