ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २५-२६ ] अध्याय २ ११९ लोके=लोकमे; देवादिवत्=देवता आदिकी भाँति; अपि=( बिना उपकरण- के ) भी; ( कार्य करनेकी शक्ति देखी जाती है ) । व्याख्या—जैसे लोकमे देवता और योगी आदि बिना किसी उपकरणकी सहायताके अपनी अद्भुत शक्तिके द्वारा ही बहुत-से शरीर आदिकी रचना कर लेते हैं; बिना किसी साधन-सामग्रीके संकल्पमात्रसे मनोवाञ्छित विचित्र पदार्थोंको प्रकट कर लेते हैं* उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न परमेश्वर अपने सङ्कल्प- मात्रसे यदि जड-चेतनके समुदायरूप विचित्र जगत्की रचना कर दे या स्वयं उसके रूपमे प्रकट हो जाय तो क्या आश्चर्य है। साधारण मकड़ी भी अपनी ही शक्तिसे अन्य साधनोके बिना ही जाला बना लेती है, तब सर्वशक्तिमान् परमेश्वर- को इस जगत्का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमे क्या आपत्ति हो सकती है। सम्बन्ध—उपर्युक्त बातको दृढ करनेके लिये शङ्का उपस्थित करते हैं— कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा ॥ २ । १ । २६ ॥ कृत्स्नप्रसक्तिः=( ब्रह्मको जगत्का कारण माननेपर ) वह पूर्णरूपसे जगत्- के रूपमे परिणत हो गया, ऐसा माननेका दोष उपस्थित होगा, वा=अथवा; निरवयवत्वशब्दकोपः=उसको अवयवरहित बतानेवाले श्रुतिके शब्दोसे विरोध होगा। व्याख्या—पूर्वपक्षका कहना है कि यदि ब्रह्मको जगत्का कारण माना जायगा तो उसमे दो दोष आवेगे। एक तो यह कि ब्रह्म अवयवरहित होनेके कारण अपने सम्पूर्ण रूपसे ही जगत्के आकारमे परिणत हो गया, ऐसा मानना पड़ेगा, फिर जगत्से भिन्न ब्रह्मनामकी कोई वस्तु नहीं रही। यदि ब्रह्म सावयव होता तो ऐसा समझते कि उसके शरीरका एक अंश विकृत होकर जगद्रूपमे परिणत हो गया और शेष अंश ब्रह्मरूपमे ही स्थित है, परंतु वह अवयवयुक्त तो है नहीं; क्योकि श्रुति 'उसे निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य और निरञ्जन बताती है,† दिव्य और अमूर्त आदि विशेषणोसे विभूषित करती है‡। ऐसी दशा- मे पूर्णत ब्रह्मका परिणाम मान लेनेपर उसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन
- देखिये वाल्मीकिरामायण तथा रामचरितमानसमे भरद्वाजजीके द्वारा भरतके आतिथ्यसत्कारका प्रसङ्ग । † निष्क्रियं निष्कलं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । ( श्वेता० ६ । १९ ) ‡ दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । ( मु० उ० २ । १ । २ )