ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २७-२८ ] अध्याय २ १२१ ऐसा श्रुतिने स्पष्ट शब्दोमे वर्णन किया है। अतः ब्रह्मको जगत्का कारण माननेमे पूर्वोक्त दोनो ही दोष नहीं प्राप्त होते हैं। सम्बन्ध—इसी बातको युक्तिसे भी दृढ़ करते हैं— आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ॥ २ । १ । २८ ॥ च=इसके सिवा ( युक्तिसे भी इसमे कोई विरोध नहीं है ); हि=क्योंकि; आत्मनि=( अवयवरहित ) जीवात्मामे; च=भी; एवम्=ऐसी; विचित्राः=विचित्र सृष्टियाँ ( देखी जाती हैं ) । व्याख्या—पूर्व सूत्रमें ब्रह्मके विषयमे केवल श्रुति-प्रमाणकी गति बतायी गयी, सो तो है ही, उसके सिवा, विचार करनेपर युक्तिसे भी यह बात समझने आ सकती है कि अवयवरहित परब्रह्मसे इस विचित्र जगत्का उत्पन्न होना असंगत नहीं है; क्योंकि स्वप्नावस्थामे इस अवयवरहित निर्विकार जीवात्मासे नाना प्रकारकी विचित्र सृष्टि होती देखी जाती है; यह सबके अनुभवकी बात है । योगी लोग भी स्वयं अपने स्वरूपसे अविकृत रहते हुए ही अनेक प्रकारकी रचना करते हुए देखे जाते हैं। महर्षि विश्वामित्र, च्यवन, भरद्वाज, वसिष्ठ तथा उनकी धेनु नन्दिनी आदिमे अद्भुत सृष्टि-रचनाशक्तिका वर्णन इतिहास-पुराणोमे जगह-जगह पाया जाता है। जब ऋषि-मुनि आदि विशिष्ट जीवकोटिके लोग भी स्वरूपसे अविकृत रहकर विचित्र सृष्टि-निर्माणमे समर्थ हो सकते हैं, तब परब्रह्ममें ऐसी शक्तिका होना तो कोई आश्चर्यकी बात ही नहीं है। विष्णुपुराणमे प्रश्न और उत्तरके द्वारा इस बातको बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।*
- निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः । कथं सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणोऽभ्युपगम्यते ॥ ( वि० पु० १ । ३ । १ ) मैत्रेय पूछते हैं, 'मुने ! जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय, शुद्ध और निर्मलात्मा है, उसे सृष्टि आदिका कर्ता कैसे माना जा सकता है ?' शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्यज्ञानगोचराः । यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः । भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता ॥ ( वि० पु० १ । ३ । २-३ ) पराशर मुनि उत्तर देते हैं—'तपस्वियोंमे श्रेष्ठ मैत्रेय ! समस्त भावपदार्थोंकी शक्तियाँ अचिन्त्य ज्ञानकी विषय हैं, ( साधारण मनुष्य उनको नहीं समझ सकता ) अग्निकी उष्णता-शक्तिकी भाँति ब्रह्मकी भी सर्गादिरचना-रूप शक्तियाँ स्वाभाविक हैं।'