ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अतः किसी भी युक्तिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि जड प्रधान इस जगत्का कारण है । सम्बन्ध—अब दूसरी युक्तिसे प्रधानकारणवादका खण्डन करते हैं— प्रवृत्तेश्च ॥ २ । २ । २ ॥ प्रवृत्तेः=जगत्की रचनाके लिये जड प्रकृतिका प्रवृत्त होना; च=भी सिद्ध नहीं होता ( इसलिये प्रधान इस जगत्का कारण नहीं है ) । व्याख्या—जगत्की रचना करना तो दूर रहा, रचनादि कार्यके लिये जड प्रकृतिमे प्रवृत्तिका होना भी असम्भव जान पड़ता है; क्योकि साम्यावस्थामे स्थित सत्त्व, रज और तम—इन तीनो गुणोका नाम प्रधान या प्रकृति है,* उस जड प्रधानका बिना किसी चेतनकी सहायताके सृष्टिकार्य प्रारम्भ करनेके लिये प्रवृत्त होना कदापि सम्भव नहीं है । कोई भी जड पदार्थ चेतनका सहयोग प्राप्त हुए बिना कभी अपने आप किसी कार्यमें प्रवृत्त होता हो, ऐसा नहीं देखा जाता है । सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षीके द्वारा दिये जानेवाले जल आदिके दृष्टान्तमें भी चेतनका सहयोग दिखलाकर उपर्युक्त बातकी ही सिद्धि करते हैं— पयोऽम्बुवच्चेत्तत्रापि ॥ २ । २ । ३ ॥ चेत्=यदि कहो; पयोऽम्बुवत्=दूध और जलकी भाँति ( जड प्रधानका सृष्टि-रचनाके लिये प्रवृत्त होना सम्भव है ); तत्रापि=तो उसमें भी चेतनका सहयोग है ( अतः केवल जडमे प्रवृत्ति न होनेसे उसके द्वारा जगत्की रचना असम्भव है ) । व्याख्या—यदि कहो कि 'जैसे अचेतन दूध बछड़ेकी पुष्टिके लिये अपने आप गायके थनमे उतर आता है † तथा अचेतन जल लोगोके उपकारके लिये अपने आप नदी-निर्झर आदिके रूपमे बहता रहता है, उसी प्रकार जड प्रधान भी जगत्की सृष्टिके कार्यमें बिना चेतनके ही स्वयं प्रवृत्त हो सकता है' तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि जिस प्रकार रथ आदि अचेतन वस्तुएँ बिना चेतनका सहयोग पाये संचरण आदि कार्योंमे प्रवृत्त नहीं होतीं, उसी प्रकार थनमें दूध उतरने और नदी-निर्झर आदिके बहनेमे भी अव्यक्त चेतनकी ही प्रेरणा
- सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः । ( सा० सू० १ । ६१ ) † अचेतनत्वेऽपि क्षीरवच्चेष्टितं प्रधानस्य । ( सां० सू० ३ । १७० )