भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ तो उत्पत्तिके लिये प्रवृत्ति नहीं होगी। इस प्रकार कोई भी व्यवस्था न हो सकनेके कारण प्रधान जगत्‌का कारण नहीं हो सकता। सम्बन्ध—तृणसे दूध बननेकी भाँति प्रकृतिसे स्वभावतः जगत्‌की उत्पत्ति होती है, इस कथनकी असंगति दिखाते हुए कहते हैं— अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् ॥ २ । २ । ५ ॥ अन्यत्र=दूसरे स्थानमे; अभावात्=वैसे परिणामका अभाव है, इसलिये; च=भी; तृणादिवत्=तृण आदिकी भाँति; ( प्रधानका जगत्‌के रूपमें परिणत होना ) न=नहीं सिद्ध होता । व्याख्या—जो घास ब्यायी हुई गौद्वारा खायी जाती है, उसीसे दूध बनता है। वही घास यदि बैल या घोड़ेको खिला दी जाय या अन्यत्र रख दी जाय तो उससे दूध नहीं बनता। इस प्रकार अन्य स्थानोमे घास आदिका वैसा परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि विशिष्ट चेतनके सहयोग बिना जड प्रकृति जगत्रूपमे परिणत नहीं हो सकती। जैसे तृण आदि- का दूधके रूपमे परिणत होना तभी सम्भव होता है, जब उसे ब्यायी हुई चेतन गौके उदरमे स्थित होनेका अवसर मिलता है सम्बन्ध—प्रधानसे जगत्-रचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति मानना व्यर्थ है, यह बतानेके लिये कहते हैं— अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ॥ २ । २ । ६ ॥ अभ्युपगमे=( अनुमानसे प्रधानमे सृष्टिरचनाकी स्वाभाविक प्रवृत्ति ) स्वीकार कर लेनेपर; अपि=भी; अर्थाभावात्=कोई प्रयोजन न होनेके कारण ( यह मान्यता व्यर्थ ही होगी ) । व्याख्या—यद्यपि चेतनकी प्रेरणाके बिना जड प्रकृतिका सृष्टि-रचना आदि कार्यमे प्रवृत्त होना नहीं बन सकता, तथापि यदि यह मान लिया जाय कि स्वभावसे ही प्रधान जगत्‌की उत्पत्तिके कार्यमे प्रवृत्त हो सकता है तो इसके लिये कोई प्रयोजन नहीं दिखायी देता; क्योंकि सांख्यमतमें माना गया है कि प्रधानकी प्रवृत्ति पुरुषके भोग और अपवर्गके लिये ही होती है। * परंतु उनकी

  • पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य। ( सांख्य-का० २१ )