भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

( १६ ) सूत्र विषय पृष्ठ ११-२६ सर्वान्तर्यामी परमात्माका किसी भी स्थान-दोषसे लिप्त न होना, परमेश्वरका निर्गुण निर्विशेष, सगुण सविशेष दोनों लक्षणोंसे युक्त होना, इसमे सम्भावित विरोधका परिहार, उक्त दोनों लक्षणोंकी मुख्यता, परमात्मामे भेदका अभाव, सगुणरूपकी औपाधिकताका निराकरण, प्रतिबिम्बके दृष्टान्तका रहस्य, परमेश्वरमे शरीरके वृद्धि-ह्रास आदि दोषोंका अभाव, निषेध श्रुतियोंद्वारा इयत्तामात्रका प्रतिषेध, निर्गुण-सगुण दोनों स्वरूपोंका मन-बुद्धिसे अतीत होना तथा आराधनासे भगवान्‌के प्रत्यक्ष दर्शन होनेका कथन ... २३४-२४५ २७-३३ परमात्माका अपनी शक्तियोसे अभेद और भेद तथा अभेदो- पासना और भेदोपासनाके उपदेशका अभिप्राय २४५-२५१ ३४-३७ शरीर आदिके सम्बन्धसे जीवोंके परस्पर भेदकी सिद्धि, प्रकृतियोंमे भेद होनेपर भी परब्रह्ममे भेद या नानात्वका अभाव २५१-२५३ ३८-४१ कर्मोंका फल देनेवाला परमात्मा ही है, कर्म नहीं; इसका प्रतिपादन ... ... ... २५३-२५४ तीसरा पाद १-१० वेदान्तवर्णित समस्त ब्रह्मविद्याओकी एकता, भेद-प्रतीतिका निराकरण, शाखा-विशेषके लिये ही शिरोव्रत आदिका नियम, समानविद्याके प्रकरणमे एक जगह कही हुई बातोंके अन्यत्र अध्याहार करनेका कथन, उद्देश्यकी एकता होनेपर विद्याओंमे भेदका अभाव, ब्रह्मविद्यासे भिन्न विद्याओंकी एकता या भिन्नताके निर्णयमे संज्ञा आदि हेतुओके उपयोगका कथन २५५-२६२ ११-१८ ब्रह्मके 'आनन्द' आदि धर्मोंका ही अन्यत्र अध्याहार उचित- 'प्रियशिरस्त्व' रूपकगत धर्मोंका नहीं, आनन्दमयकी ब्रह्म- रूपता, विरोध-परिहार, तथा अन्न-रसमय पुरुषके ब्रह्म न होनेका प्रतिपादन ... ... ... २६२-२६७ १९-२५ एक शाखामे कही विद्याकी एकता, नेत्र एवं सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोंके नाम और गुणका एक दूसरेमें अध्याहारकी अनावश्यकता, उक्त पुरुषोमे ब्रह्मके सर्वाधारता और सर्व- व्यापकता आदि धर्मोंके, पुरुष-विद्यामे प्रतिपादित दिव्य गुणोंके तथा कठवर्णित वेद्यत्व आदि धर्मोंके भी अध्याहारका अनौचित्य ... ... ... २६७-२७२