ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २६-२८ ] अध्याय २ १४९ हो सकती। बीज और दूधका अभाव नहीं होता। किन्तु रूपान्तर मात्र होता है, अतः जगत्का कारण सत् है और वह सर्वथा सत्य है। इसलिये बौद्धोकी उपर्युक्त मान्यता असङ्गत है। सम्बन्ध—किसी नित्य चेतन कर्त्ताके बिना क्षणिक पदार्थोंसे अपने-आप कार्य उत्पन्न होते हैं, इस मान्यताका खण्डन दूसरी युक्तिके द्वारा करते हैं— उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः ॥ २ । २ । २७ ॥ च=इसके सिवा; एवम्=इस प्रकार ( बिना कर्ताके स्वतः कार्यकी उत्पत्ति ) माननेपर; उदासीनानाम्=उदासीन ( कार्य-सिद्धिके लिये चेष्टा न करनेवाले ) पुरुषोंका; अपि=भी; सिद्धिः=कार्य सिद्ध हो सकता है। व्याख्या—यदि ऐसा माना जाय कि 'कार्यकी उत्पत्ति होनेमे किसी नित्य चेतन कर्ताकी आवश्यकता नहीं है, क्षणिक पदार्थोंके समुदायसे अपने-आप कार्य उत्पन्न हो जाता है' तब तो जो लोग उदासीन रहते है, कार्य आरम्भ नहीं करते या उसकी सिद्धिकी चेष्टासे विरत रहते हैं, उनके कार्य भी पदार्थ- गत शक्तिसे अपने-आप सिद्ध हो जाने चाहिये। परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता। इससे यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त मान्यता समीचीन नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक बौद्धोंके क्षणिकवादका खण्डन किया गया। अब विज्ञान- वादका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। विज्ञानवादी बौद्ध (योगाचार) मानते हैं कि प्रतीत होनेवाला बाह्यपदार्थ वास्तवमे कुछ नहीं है, केवलमात्र स्वप्नकी भाँति बुद्धिकी कल्पना है; इस मान्यताका खण्डन करते हैं— नाभाव उपलब्धेः ॥ २ । २ । २८ ॥ अभावः=जाननेमे आनेवाले पदार्थोंका अभाव; न=नहीं है; उपलब्धेः= क्योकि उनकी उपलब्धि होती है। व्याख्या—जाननेमे आनेवाले बाह्यपदार्थ मिथ्या नहीं हैं, वे कारणरूपमें तथा कार्यरूपमे भी सदा ही सत्य है। इसलिये उनकी प्रत्यक्ष उपलब्धि होती है। यदि वे स्वप्नगत पदार्थों तथा आकाशमे दीखनेवाली नीलिमा आदिकी भाँति सर्वथा मिथ्या होते तो इनकी उपलब्धि नहीं होती। सम्बन्ध—विज्ञानवादियोंकी ओरसे यह कहा जा सकता है कि 'उपलब्धि- मात्रसे पदार्थकी सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती; क्योंकि स्वप्नमे प्रतीत होनेवाले तथा