ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 186, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ७—१० ] अध्याय २ १६५ एतेन=इससे अर्थात् आकाशकी उत्पत्ति सिद्ध करनेवाले कथनसे ही; मातरिश्वा=वायुका उत्पन्न होना; व्याख्यातः=बता दिया गया । व्याख्या—जिन युक्तियो और श्रुतिप्रमाणोद्वारा पूर्वसूत्रोमे ब्रह्मसे आकाशका उत्पन्न होना निश्चित किया गया, उन्हींसे यह कहना भी हो गया कि वायु भी उत्पन्न होता है। अतः उसके विषयमे अलग कहना आवश्यक नहीं समझा गया। सम्बन्ध—इस प्रकार आकाश और वायुको उत्पत्तिशील बतलाकर अब इस दृश्य-जगत्में जिन तत्त्वोंको दूसरे मतवाले नित्य मानते हैं तथा जिनकी उत्पत्ति- का स्पष्ट वर्णन वेदमे नही आया है, उन सबको भी उत्पत्तिशील बतानेके लिये अगला सूत्र कहते हैं— असम्भवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ॥ २ । ३ । ९ ॥ सतः='सत्' शब्दवाच्य ब्रह्मके सिवा (अन्य किसीका उत्पन्न न होना); तु=तो; असम्भवः = असम्भव है; अनुपपत्तेः=क्योकि 'अन्य किसीका उत्पन्न न होना युक्ति और प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या—जिस पूर्णब्रह्म परमात्माका श्रुतिमें जगह-जगह सत् नामसे वर्णन आया है तथा जो इस जड-चेतनात्मक जगत्का परम कारण माना गया है, उसे छोड़कर इस जगत्में कोई भी तत्त्व ऐसा नहीं है, जो उत्पत्तिशील न हो। बुद्धि, अहङ्कार, काल तथा गुण और परमाणु आदि सभी उत्पत्तिशील है; क्योकि वेदमे प्रलयके समय एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरसे भिन्न किसीका अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है। इसलिये युक्ति या प्रमाणद्वारा कोई भी पदार्थ उत्पन्न न होनेवाला सिद्ध नहीं हो सकता। अतः ब्रह्मके सिवा सब कुछ उत्पत्तिशील है। सम्बन्ध—छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा है कि 'उस ब्रह्मने तेजको रचा' और तैत्तिरीयोपनिषद्में बताया गया है कि 'सर्वात्मा परमेश्वरसे आकाश उत्पन्न हुआ, आकाशसे वायु और वायुसे तेज।' अतः यहाँ तेजको किससे उत्पन्न हुआ माना जाय ? ब्रह्मसे या वायुसे ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— तेजोऽतस्तथा ह्याह ॥ २ । ३ । १० ॥ तेजः = तेज; अतः = इस ( वायु ) से ( उत्पन्न हुआ ); तथा हि = ऐसा ही; आह=अन्यत्र कहा है।