भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (३ । १ । ९) अर्थात् 'यह अणु परिमाणवाला आत्मा चित्तसे जाननेके योग्य है।' तथा श्वेताश्वतरमें कहा है कि 'वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः।' (५ । ९) अर्थात् 'बालके अग्रभागके सौ टुकड़े किये जायें और उनमेंसे एक टुकड़ेके पुनः एक सौ टुकड़े किये जायँ, तो उतना ही माप जीवात्माका समझना चाहिये।' इस प्रकार श्रुतिमे स्पष्ट शब्दोंमें जीवको 'अणु' कहा गया है तथा उपमासे भी उसका अणुके तुल्य माप बताया गया है एवं युक्तिसे भी यही समझमे आता है कि जीवात्मा अणु है; अन्यथा वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म शरीरमें प्रविष्ट कैसे हो सकता ? अतः यही सिद्ध होता है कि जीवात्मा अणु है। सम्बन्ध—जीवात्माको शरीरके एक देशमें स्थित मान लेनेसे उसको समस्त शरीरमें होनेवाले सुख-दुःखादिका अनुभव कैसे होगा ? इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे कहा जाता है— अविरोधश्चन्दनवत् ॥ २ । ३ । २३ ॥ चन्दनवत् = जिस प्रकार एक देशमे लगाया हुआ चन्दन अपने गन्धरूप गुणसे सब जगह फैल जाता है, वैसे ही एक देशमे स्थित आत्मा विज्ञानरूप गुण- द्वारा समस्त शरीरको व्याप्त करके सुख-दुःखादिका ज्ञाता हो जाता हैं, अतः; अविरोधः = कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जीवको अणु मान लेनेपर उसको शरीरके प्रत्येक देशमे होनेवाली पीड़ाका ज्ञान होना युक्तिविरुद्ध प्रतीत होता है, ऐसी शङ्का भी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि जिस प्रकार किसी एक देशमें लगाया हुआ या मकानमे किसी एक जगह रक्खा हुआ चन्दन अपने गन्धरूप गुणसे सब जगह फैल जाता है, वैसे ही शरीरके भीतर एक जगह हृदयमें स्थित हुआ जीवात्मा अपने विज्ञानरूप गुणके द्वारा समस्त शरीरमे फैल जाता है और सभी अङ्गोंमें होनेवाले सुख- दुःखोंको जान सकता है। सम्बन्ध—शरीरके एक देशमें आत्माकी स्थिति है—यह सिद्ध करनेके लिये पूर्वपक्षी कहता है— अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाध्युपगमाद्धृदि हि ॥ २ । ३ । २४ ॥