ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २९ ] अध्याय २ १७७ आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है।' (गीता २ । २४), 'जिस प्रकार सब जगह व्याप्त हुआ भी आकाश सूक्ष्म होनेके कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी शरीरमें सब जगह स्थित है तो भी उससे लिप्त नहीं होता।' (गीता १३ । ३२) तथा 'उस आत्माको तू अविनाशी समझ, जिससे यह समस्त जडसमुदाय व्याप्त है।' (गीता २ । १७)—इन प्रमाणोंके विषयमे यह नहीं कहा जा सकता कि ये परमात्माके प्रकरणमे आये हैं। सम्बन्ध—इसपर यह जिज्ञासा होती है कि यदि ऐसी बात है तो श्रुतिमें जो स्पष्ट शब्दोंमें आत्माको अणु और अङ्गुष्ठमात्र कहा है, उसकी सङ्गति कैसे होगी ? इसपर कहते हैं— तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत् ॥ २ । ३ । २९ ॥ तद्व्यपदेशः=वह कथन; तु=तो; तद्गुणसारत्वात्=उस बुद्धि आदिके गुणोंकी प्रधानताको लेकर है; प्राज्ञवत्=जैसे परमेश्वरको अणु और हृदयमें स्थित अङ्गुष्ठमात्र बताया है, वैसे ही जीवात्माके लिये भी समझना चाहिये। व्याख्या—श्रुतिमे जीवात्माको अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला कहते हुए इस प्रकार वर्णन किया गया है— अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहङ्कारसमन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ 'जो अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला, सूर्यके सदृश प्रकाशस्वरूप तथा सङ्कल्प और अहङ्कारसे युक्त है, वह बुद्धिके गुणोंसे और शरीरके गुणोंसे ही आरेकी नोक-जैसे सूक्ष्म आकारवाला है—ऐसा परमात्मासे भिन्न जीवात्मा भी निस्सन्देह ज्ञानियोंद्वारा देखा गया है।' (श्वेता० उ० ५ । ८) जीवात्माकी गति- आगतिका वर्णन भी शरीरादिके सम्बन्धसे ही है (कौ० उ० ३ । ६; प्र० उ० ३ । ९, १०) *। इससे यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि श्रुतिमें जहाँ कहीं जीवात्माको एकदेशी 'अङ्गुष्ठमात्र' या 'अणु' कहा गया है, वह बुद्धि और शरीर- के गुणोंको लेकर ही है; जैसे परमात्माको भी जगह-जगह जीवात्माके हृदयमें स्थित (क० उ० १ । ३ । १; प्र० उ० ६ । २; मु० उ० २ । १ । १० तथा २ । २ । १; ३ । १ । ५; ७; श्वेता० उ० ३ । २०) तथा अङ्गुष्ठमात्र भी (क० उ० २ । १ । १२-१३) बताया है। वह कथन स्थानकी अपेक्षासे ही है, उसी प्रकार
- यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति । वे० द० १२—