भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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१८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ शरीरादि सम्बन्धका; तु=ही; अभिव्यक्तियोगात्=सृष्टिकाळमें प्रकट होनेका योग है, इसलिये ( कोई दोष. नहीं है ) । व्याख्या-प्रलयकाळमें यद्यपि बुद्धि आदि तत्त्व स्थूलरूपमे न रहकर अपने कारणरूप परंब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाते हैं, तथापि भगवान्‌की अचिन्त्य शक्तिके रूपमें वे अव्यक्तरूपसे सब-के-सब विद्यमान रहते हैं । तथा सब जीवात्मा भी अपने-अपने कर्मसंस्काररूप कारण-शरीरोंके सहित अव्यक्तरूपसे उस परब्रह्म परमेश्वरमे विलीन रहते हैं ( प्र० उ० ४ । ११ ) ।* उनका सर्वथा नाश नहीं होता । अतः सृष्टिकालमें उस परब्रह्म परमात्माके संकल्पसे वे उसी प्रकार सूक्ष्म और स्थूल रूपोंमें प्रकट हो जाते हैं; जैसे बीजरूपमे पहलेसे ही विद्यमान पुरुषत्व बाल्यकालमें प्रकट नहीं होता, किन्तु युवावस्थामें शक्तिके संयोगसे प्रकट हो जाता है । यही बात बीज-वृक्षके सम्बन्धमे भी समझी जा सकती है । ( गीता अध्याय १४ श्लोक ३ और ४ में यही बात स्पष्ट की गयी है ) इसलिये कोई विरोध नहीं है । जिस साधकका अन्तःकरण साधनाके द्वारा जितना शुद्ध और व्यापक होता है, वह उतना ही विशाल हो जाता है । यही कारण है कि योगीमें दूर देशकी बात जानने आदिकी सामर्थ्य आ जाती है; क्योकि जीवात्मा तो पहलेसे सर्वत्र व्याप्त है ही, अन्तःकरण और स्थूल शरीरके सम्बन्धसे ही वह उसके अनुरूप आकारवाला हो रहा है । सम्बन्ध-जीवात्मा तो स्वयंप्रकाशस्वरूप है, उसे मन, बुद्धिके सम्बन्धसे वस्तुका ज्ञान होता है, यह माननेकी क्या आवश्यकता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं- नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वान्यथा ॥ २ । ३ । ३२ ॥ अन्यथा=जीवको अन्तःकरणके सम्बन्धसे विषय-ज्ञान होता है, ऐसा न माननेपर; नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गः=उसे सदा ही विषयोंके अनुभव होनेका या कभी भी न होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; वा=अथवा; अन्यतरनियमः= आत्माकी ग्राहकता-शक्ति या विषयकी ग्राह्यता-शक्तिके नियमन ( प्रतिबन्ध ) की ॐ यह मन्त्र पूर्वसूत्रकी टिप्पणीमें आ गया है ।