भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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३८८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ है और फिर उसका फल-भोग करवाता है, यह माननेसे ईश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष आयेगा, उसका निराकरण कैसे होगा, इसपर कहते हैं— कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रतिषिद्धावैयर्थ्या- दिभ्यः ॥ २ । ३ । ४२ ॥ तु=किन्तु; कृतप्रयत्नापेक्षः=ईश्वर जीवके पूर्वकृत कर्म-संस्कारोंकी अपेक्षा रखते हुए ही उसको नवीन कर्मोंमें नियुक्त करता है, इसलिये तथा; विहितप्रति- षिद्धावैयर्थ्यादिभ्यः=विधि-निषेध शास्त्रकी सार्थकता आदि हेतुओसे भी ईश्वर सर्वथा निर्दोष है । व्याख्या—ईश्वरद्वारा जो जीवात्माको नवीन कर्म करनेकी शक्ति देकर उसे नवीन कर्मोंमें नियुक्त किया जाता है, वह उस जीवात्माके जन्म-जन्मान्तरमे सञ्चित किये हुए कर्म-संस्कारसे उत्पन्न स्वभावकी अपेक्षासे ही किया जाता है, बिना अपेक्षाके नहीं । इसलिये ईश्वर सर्वथा निर्दोष है तथा ऐसा करनेसे ही शास्त्रोंमें अच्छे काम करनेके लिये कहे हुए विधि-वाक्योंकी और पापाचरण न करनेके लिये कहे हुए निषेध-वाक्योंकी सार्थकता सिद्ध होती है । तथा ईश्वरने जीवको अपने स्वभावका सुधार करनेके लिये जो स्वतन्त्रता प्रदान की है, वह भी सार्थक होती है । इसलिये ईश्वरका यह कर्म न्याय ही है । इसी भावको स्पष्ट करनेके लिये गीतामे भगवान्ने कहा है कि— स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा । कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ 'हे कुन्तीपुत्र ! अपने जन्म-जन्मान्तरके कर्मसंस्काररूप स्वभावजनित कर्मोंद्वारा बँधा हुआ तू जिस कामको नहीं करना चाहता उसे भी परवश हुआ अवश्य करेगा ।' ( गी० १८ । ६० ) इसके बाद ही यह भी कहा है कि 'सबके हृदयमे स्थित परमेश्वर सबसे चेष्टा कराता है ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वर जीवोद्वारा जन्म-जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंकी अपेक्षासे ही उनको कर्म करनेकी शक्ति आदि प्रदान करके स्वाभाविक स्वधर्मरूप नवीन कर्मोंमें नियुक्त करते हैं । इसलिये ईश्वर सर्वथा निर्दोष हैं । सम्बन्ध—पूर्वप्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि जीवात्मा कर्ता है और