ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४४-४५ अध्याय २ १९१ सम्बन्ध—प्रमाणान्तरसे जीवके अंशत्वको सिद्ध करते हैं— मन्त्रवर्णाच्च ॥ २ । ३ । ४४ ॥ मन्त्रवर्णात् = मन्त्रके शब्दोंसे; च = भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—मन्त्रमे कहा है कि पहले जो कुछ वर्णन किया गया है उतना तो इस परब्रह्म परमेश्वरका महत्त्व है ही; वह परमपुरुष उससे अधिक भी है, समस्त जीव-समुदाय इस परब्रह्मका एक पाद (अंश) है और इसके तीन पाद अमृत- स्वरूप दिव्य (सर्वथा अलौकिक अपने ही विज्ञानानन्दस्वरूपमे) हैं।'* (छा० उ० ३ । १२ । ६) । इस प्रकार मन्त्रके शब्दोंमे स्पष्ट ही समस्त जीवोंको ईश्वरका अंश बताया गया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि जीवगण परमेश्वरके अंश हैं। सम्बन्ध—उसी बातको स्मृतिप्रमाणसे सिद्ध करते हैं— अपि च स्मर्यते ॥ २ । ३ । ४५ ॥ अपि = इसके सिवा; स्मर्यते च = (भगवद्गीता आदिमे) यही स्मरण भी किया गया है। व्याख्या—यह बात केवल मन्त्रमे ही नहीं कही गयी है, अपि तु गीता (१५ । ७) मे साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने भी इसका अनुमोदन किया है— 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।' 'इस जीवलोकमे यह जीव-समुदाय मेरा ही अंश है।' इसी प्रकार दसवें अध्यायमे अपनी मुख्य-मुख्य विभूतियो अर्थात् अंशसमुदायका वर्णन करके अन्त (१० । ४२) मे कहा है कि— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 'अर्जुन ! तुझे इस बहुत भेदोंको अलग-अलग जाननेसे क्या प्रयोजन है, तू बस इतना ही समझ ले कि मैं अपनी शक्तिके किसी एक अंशसे इस समस्त जगत्को भलीभाँति धारण किये हुए स्थित हूँ।' दूसरी जगह भी ऐसा ही वर्णन आता है—'हे मैत्रेय ! एक पुरुष जीवात्मा जो कि अविनाशी, शुद्ध, नित्य और सर्वव्यापी है, वह भी सर्वभूतमय विज्ञानानन्दघन परमात्माका अंश ही है।'†
- यह मन्त्र पहले पृष्ठ १६ मे आ गया है। † एकः शुद्धोऽक्षरो नित्यः सर्वव्यापी तथा पुमान् । सोऽप्यंशः सर्वभूतस्य मैत्रेय परमात्मनः ॥ (वि० पु० ६ । ४ । ३६)