भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

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सूत्र ४६—४९ ] अध्याय २ १९३ कमलका पत्ता जलमे रहता हुआ जलसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही वह जीवके कर्मफलोसे लिप्त नही होता ( महाभारत शान्तिपर्व ३५१ । १४—१५) । इसी प्रकार श्रुतिमें भी कहा है कि 'उन दोनोंमेंसे एक जीवात्मा तो पीपलके फलोंको अर्थात् कर्मफलरूप सुख-दुःखोंको भोगता है और परमेश्वर न भोगता हुआ देखता रहता है । (मु० उ० ३ । १ । १) इससे भी यही सिद्ध होता है कि परमात्मा किसी प्रकारके दोषोंसे लिप्त नहीं होता । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'जब सभी जीव एक ही परमेश्वरके अंश हैं, तब किसी एकके लिये जिस कामको करनेकी आज्ञा दी जाती है, दूसरे- के लिये उसीका निषेध क्यों किया जाता है ? शास्त्रमें जीवोंके लिये भिन्न-भिन्न आदेश दिये जानेका क्या कारण है ?' इसपर कहते हैं— अनुज्ञापरिहारौ देहसम्बन्धाज्ज्योतिरा- दिवत् ॥ २ । ३ । ४८ ॥ अनुज्ञापरिहारौ=विधि और निषेध; ज्योतिरादिवत्=ज्योति आदिकी भाँति; देहसम्बन्धात्=शरीरोंके सम्बन्धसे हैं। व्याख्या—भिन्न-भिन्न प्रकारके शरीरोंके साथ जीवात्माओंका सम्बन्ध होनेसे उनके लिये अनुज्ञा और निषेधका भेद अनुचित नहीं है । जैसे, श्मशानकी अग्निको त्याज्य और यज्ञकी अग्निको ग्राह्य बताया जाता है तथा जैसे शूद्रको सेवा करने- के लिये आज्ञा दी है और ब्राह्मणके लिये सेवा-वृत्तिका निषेध किया गया है, इसी प्रकार सभी जगह समझ लेना चाहिये । शरीरोंके सम्बन्धसे यथायोग्य भिन्न-भिन्न प्रकारका विधि-निषेधरूप आदेश उचित ही है, इसमें कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकारसे विधि-निषेधकी व्यवस्था होनेपर भी जीवात्माओंको विभु माननेसे उनका और उनके कर्मोंका अलग-अलग विभाग कैसे होगा ? इसपर कहते हैं— असन्ततेश्चाव्यतिकरः ॥ २ । ३ । ४९ ॥ च=इसके सिवा; असन्ततेः =( शरीरोंके आवरणसे ) व्यापकताका निरोध होनेके कारण; अव्यतिकरः =उनका तथा उनके कर्मोंका मिश्रण नहीं होगा । व्याख्या—जिस प्रकार कारणशरीरका आवरण होनेसे सब जीवात्मा विभु होते वे० द० १३—