ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 417 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ५०-५२ ] अध्याय २ १९५ परमात्माका अंश कहा जाता है, वह अंशांशिभाव वास्तविक नहीं है, घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे प्रतीत होता है, ऐसा माना जाय तो क्या आपत्ति है? अदृष्टानियमात् ॥ २ । ३ । ५१ ॥ अदृष्टानियमात् = अदृष्ट अर्थात् जन्मान्तरमे किये हुए कर्मफलभोगकी कोई नियत व्यवस्था नहीं हो सकेगी; इसलिये (उपाधिके निमित्तसे जीवोंको परमात्माका अंश मानना युक्तिसंगत नहीं है ) । व्याख्या—जीवोंको परमात्माका अंश न मानकर अलग-अलग स्वतन्त्र माननेसे तथा घटाकाशकी भाँति उपाधिके निमित्तसे जीवगणको परमात्माका अंश माननेसे भी जीवोंके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था नहीं हो सकेगी; क्योकि यदि जीवोको अलग-अलग स्वतन्त्र मानते हैं, तब उनके कर्म-फल-भोगकी व्यवस्था कौन करेगा। जीवात्मा स्वयं अपने कर्मोंका विभाग करके ऐसा नियम बना ले कि अमुक कर्म- का अमुक फल मुझे अमुक प्रकारसे भोगना है, तो यह सम्भव नहीं है। कर्म जड हैं, अत. वे भी अपने फलका भोग करानेकी व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकते। यदि ऐसा माने कि एक ही परमात्मा घटाकाशकी भाँति अनादिसिद्ध शरीरादिकी उपाधियोंके निमित्तसे नाना जीवोंके रूपमे प्रतीत हो रहा है, तो भी उन जीवोंके कर्मफलभोगकी व्यवस्था नहीं हो सकती; क्योकि इस मान्यताके अनुसार जीवात्मा और परमात्माका भेद वास्तविक न होनेके कारण समस्त जीवोंके कर्मोंका विभाग करना, उनके भोगनेवाले जीवोंका विभाग करना तथा परमात्माको उन सबसे अलग रहकर उनके कर्मफलोका व्यवस्थापक मानना सम्भव न होगा। अतः श्रुतिके कथनानुसार यही मानना ठीक है कि सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर ही सबके कर्मफलोंकी यथायोग्य व्यवस्था करता है। तथा सब जीव उसीसे प्रकट होते हैं, इसलिये पिता-पुत्रकी भाँति उसके अंश हैं। सम्बन्ध—केवल कर्मफलभोगमें ही नहीं, सङ्कल्प आदिमें भी उसी दोषकी प्राप्ति दिखाते हैं— अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ॥ २ । ३ । ५२ ॥ च=इसके सिवा; एवम्=इसी प्रकार; अभिसन्ध्यादिषु=सङ्कल्प आदिमें; अपि=भी ( अव्यवस्था होगी ) ।