ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीपरमात्मने नमः वेदान्त-दर्शन ( ब्रह्मसूत्र ) ( साधारण भाषा-टीकासहित ) पहला अध्याय पहला पाद अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ । १ । १ ॥ अथ=अब; अतः=यहाँसे; ब्रह्मजिज्ञासा=ब्रह्मविषयक विचार ( आरम्भ किया जाता है ) । व्याख्या—इस सूत्रमे ब्रह्मविषयक विचार आरम्भ करनेकी बात कहकर यह सूचित किया गया है कि ब्रह्म कौन है ? उसका स्वरूप क्या है ? वेदान्तमे उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है ?—इत्यादि सभी ब्रह्मविषयक बातोंका इस ग्रन्थ- मे विवेचन किया जाता है । सम्बन्ध—पूर्व सूत्रमें जिस ब्रह्मके विषयमें विचार करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है, उसका लक्षण बतलाते हैं— जन्माद्यस्य यतः ॥ १ । १ । २ ॥ अस्य=इस जगत्के; जन्मादि=जन्म आदि ( उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय ); यतः=जिससे ( होते हैं, वह ब्रह्म है ) । व्याख्या—यह जो जड़-चेतनात्मक जगत् सर्वसाधारणके देखने, सुनने और अनुभवमें आ रहा है, जिसकी अद्भुत रचनाके किसी एक अंशपर भी विचार करनेसे बड़े-बड़े वैज्ञानिकोको आश्चर्यचकित होना पड़ता है, इस विचित्र विश्वके जन्म आदि जिससे होते हैं अर्थात् जो सर्वशक्तिमान् परात्पर परमेश्वर अपनी अलौकिक शक्तिसे इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करता है, इसका धारण, पोषण तथा नियमितरूपसे सञ्चालन करता है; फिर प्रलयकाल आनेपर जो इस समस्त विश्वको अपनेमें विलीन कर लेता है, वह परमात्मा ही ब्रह्म है । वे० द० १—