भारतकोश
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 417 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233

२१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ . व्याख्या—प्रश्नोपनिषद्में आश्वलायन मुनिने पिप्पलादसे प्राणके विषयमें कुछ प्रश्न किये हैं । उनमेंसे एक प्रश्न यह भी है कि 'यह एक शरीरको छोड़कर जब दूसरे शरीरमें जाता है, तब पहले शरीरसे किस प्रकार निकलता है ?' (प्र० उ० ३ । १) । उसके उत्तरमें पिप्पलादने कहा है कि 'जब इस शरीरसे उदानवायु निकलता है, तब यह शरीर ठण्डा हो जाता है, उस समय जीवात्मा मनमे विलीन हुई इन्द्रियोंको साथ लेकर उदानवायुके सहित दूसरे शरीरमे चला जाता है । उस समय जीवात्माका जैसा सङ्कल्प होता है, उस सङ्कल्प और मन-इन्द्रियोंके सहित यह प्राणमे स्थित हो जाता है । वह प्राण उदानके सहित जीवात्माको उसके सङ्कल्पानुसार भिन्न-भिन्न लोकों ( योनियों ) में ले जाता है ।' (प्र० उ० ३ । १० तक ) इस प्रकार जीवात्माके साथ प्राण और मन-इन्द्रिय आदिके गमनका वर्णन होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि बीजरूप सभी सूक्ष्म तत्त्वोंके सहित यह जीवात्मा एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है । छान्दोग्योपनिषद्में जो पहले-पहल श्रद्धाका हवन बताया गया है, वहाँ श्रद्धाके नामसे सङ्कल्पका ही हवन समझना चाहिये । भाव यह कि श्रद्धारूप सङ्कल्पकी आहुतिसे जो उसके सूक्ष्म शरीरका निर्माण हुआ, वही पहला परिणाम राजा सोम हुआ; फिर उसका दूसरा परिणाम वर्षारूपसे मेघमे स्थिति है, तीसरे परिणाममे पहुँचकर वह अन्नमे स्थित हुआ; चौथे परिणाम- मे वीर्यरूपसे उसकी पुरुषमे स्थिति हुई और पाँचवें परिणाममें वह गर्भ होकर स्त्रीके गर्भाशयमें स्थित हुआ । तदनन्तर वही मनुष्य होकर बाहर आया । इस प्रकार दोनों स्थलोंके वर्णनकी एकता है । प्राणका सहयोग सभी जगह है; क्योंकि गति प्राणके अधीन है, प्राणको जलमय बताया ही गया है । इस प्रकार श्रुतिके समस्त वर्णनकी सङ्गति बैठ जाती है । सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारके विरोधका उल्लेख करके उसका निराकरण करते हैं— अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ॥ ३ । १ । ४ ॥ चेत्=यदि कहो कि; अग्न्यादिगतिश्रुतेः=अग्नि आदिमें प्रवेश करनेकी बात दूसरी श्रुतिमे कही है, इसलिये ( यह सिद्ध नहीं होता ); इति न=तो यह ठीक नहीं है; भाक्तत्वात्=क्योंकि वह श्रुति अन्यविषयक होनेसे गौण है ।